बुधवार, 24 सितंबर 2008

बनिए उनका सहारा



बुजुर्गों को चाहिए अपनापन और प्यार। उनके साथ बात करने से कतराए बल्कि उनका अकेलापन बाँटने का प्रयत्न करे। बुजुर्गो के साथ बातचीत कराने के लिए धैर्य व समय की जरूरत होती है. यहीं वे लोग है जो हमारा आधार हमारी नीव होते है. आज का युवा वर्ग बुजुर्गों का उतना सम्मान नहीं करा पाते जितना वे चाहते है. हमें अपने आधार का हमेशा शुक्रिया अदा करना चाहिये उन्हें सही मान व सम्मान देना चाहिये.

बड़ती उम्र न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक क्षमता को भी प्रभावित करती है। यही कारण है की बुजुर्गों को अपनी बातों के साथ तारतम्य बैठाने में कठिनाई होती है. लेकिन इस वजह से रिश्तों में दूरी नही आना चाहिये. रिश्तों को ठोस बनाए रखने के लिए बातचीत ही एक मात्र उपाय है. अन्य लोगों द्वारा बुजुर्गों को न समझ पाना ही उन्हें एकांत प्रिय बना देता है.

हमें चाहिए की हम उनके दिल की सुने, उन्हें समझे ताकि उन्हें ये एहसास हों की उनकी भी इस दुनिया में एक पहचान हैं वजूद है। हमें बुजुर्गों के सामने एक श्रोता बनकर पेश होना चाहिए. उनकी बात बहुत ध्यान से सुनना चाहिये. असरकारक संवाद रिश्तों की गरमाहट बनाए रखने में महत्वपूर्ण होते है. उन्हें हमे ये एहसास दिलाना चाहिए कि हम उनसे कितना प्यार करते है और उनकी हमें हमेशा जरूरत है. बुजुर्गों से उनकी यादों व किस्सो के बारे में पूछने से उन्हें ये यकीन होंगा की आप उन्हें अपना मानते हैं और उनसे बात करना चाहते हैं.

किसी गंभीर विषयों की बजाए सामान्य विषयों पर बात करना चाहिए। कोशिश करें की ऐसे विषयों पर बात हो जिसमें उनकी रुचि हो. बुजुर्गों से बच्चों की तरह नहीं बात करना चाहिए. अपनी तमाम जिम्मेदारियो को निभा कर जब व्यक्ति उम्र के इस पड़ाव पर आता हैं तो उसे सहारे की जरूरत होती हैं. निश्चित रुप से विचारों की भिन्नता हों सकती है टकराव भी हों सकता है लेकिन इसका मतलब ये कदापि नहीं कि हम उन्हें नजर अंदाज कर दे.

याद रखें ये वही बुजुर्ग है जिन्होंने हाथ पकड़ कर आपको आपकी मंजिल तक पहुचाया था। आज उन्हें आपकी जरूरत है. वो आँखें जिनकी रोशनी अब कम हों गई हैं वो शरीर जो अब लाठी को सहारा बनाकर चलता है अब भी आपके स्नेह और अपनत्व को पाने के लिए लालायित है. ऐसे में कहीं आप उनसे मुँह तो नहीं फेर रहे है.

यदि आप ऐसा कर रहे है तो अपनी जिंदगी के पन्नों को जरा गौर से देखिए आप पाएँगे की आपकी हर खुशी में वो आपके साथ थे हर दुख में आपका सहारा थे आज वो आपकी और हाथ बड़ा रहे है सोचिए मत उठिए और हाथ आगे कीजिए. और फिर देखिए आप सारी दुनिया में सबसे ज्यादा खुशी के धनी होंगे.


रिश्ते खट्टे- मीठे


रिश्ते जीवन मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है.वर्तमान परिदृश्य में रिश्तों मे कड़वाहट घुलती जा रही है. कुछ रिश्ते इतने नाजुक होते है कि उन्हे विशेष तवज्जो की जरूरत होती है.कई बार अनजाने ही हमसे ऐसी गलतियाँ हो जाती है कि रिश्ते या संबंध टूट जाते है.

रिश्ता चाहे कोई भी हो भाई- बहन, माता-पिता,चाचा,मामा,मित्र या पति-पत्नि हर रिश्ते की अपनी एक गरिमा होती है साथ ही माँग भी. जब कोई प्यारा सा रिश्ता हमारी अनजानी गलतियों की वजह से टूट जाता है तब हमे अहसास होता है कि शायद कही कोइ कमी रह गयी थी

रिश्ते को बनाए रखने के लिए इस बात को समझना जरुरी है कि किस रिश्ते को हम किस नजरिए से देखते है.यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि हर रिश्ते की प्राथमिकता व महत्व अलग अलग होते है. अतः प्रत्येक रिश्ते का महत्व समझकर उसे उसी श्रेणी मे रखा जाना आवश्यक है.

जीवन मे माता-पिता से बड़ा कोई रिश्ता नही होता. कई बार युवक विवाह होने के बाद अपनी ही दुनिया मे खो जाते है जहाँ माता-पिता का कोई स्थान नही होता.जो गलत है युवको को ये बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हमारे माँ- बाप के प्रति भी कुछ कर्तव्य है जो हमे निभाने है. वही दूसरी ओर परिस्थितिया इसके विपरित भी होती है कुछ युवक माता-पिता कि सेवा करते हुये पत्नी की ओर उदासीन हो जाते है.यह भी गलत है.आवश्यकता है संतुलन की सही तालमेल की.

अपने जीवन मे आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है यह आप निर्धारित किजिए किंतु अन्य रिश्तों को भी आवश्यकता अनुरूप समय दे सम्मान दे.ताकि हर रिश्ते कि गरिमा बनी रहे.

निम्न कुछ बातो पर अमल किजिए और फिर देखिए कि आपके रिश्ते कितने मधुर बन जायेंगे :

1. छोटी- छोटी बातों को नजरअंदाज करना सिखिए.

2. क्षमा करना अपने व्यवहार मे शामिल किजिए.

3. अपने से बुजुर्ग से हमेशा आदर से बात किजिए. वो क्या कहना चाह रहे है पहले वो सुनिए बाद मे अपनी बात रखिए.

4. हमेशा आलोचक बनने की बजाए सामने वाले की अच्छाई भी देखे.

5. व्यवहार मे विनम्रता शामिल किजिए.

6. समय कभी लौट कर नही आता अतः समय रहते आपके अपनो को खुशी देने का कोई अवसर मत छोड़िए.

7. रिश्तो मे हमेशा तालमेल बनाकर रखे.दो रिश्तों के बीच हमेशा सेतु बनने का प्रयास करे उन्हे बिगाड़ने का नही.

8. रिश्तो मे संवाद बहुत आवश्यक है अतः हमेशा अपने करीबीयो से बातचीत बनाए रखे.

प्रेषक

मोनिका दुबे

स्वतंत्रता दिवस


इस बार उत्तर भारत मे भीषण सूखा पड़ा था.लोग पानी-पानी के लिये तरस रहे थे.आदिवासी बहुल इलाके मे भुखमरी का आलम था. लोग काम की तलाश मे पलायन कर रहे थे.मूक पशु पानी व चारे के बिना दम तोड़ रहे थे.पंछी कही और बसेरा करने की तलाश मे उड़ गये थे. बेजान सूखे पेड़,खाली सपाट खेत पथरीले काले पत्थर वातावरण को डरावना बना रहे थे. मरे जानवरों को खाते कुत्ते और गिद्धो के झुंड यहाँ वहाँ मँडरा रहे थे.आदिवासी क्षेत्र का कुशलपुर गाँव सूखे की चपेट मे ज्यादा था. गाँव के अधिकांश लोग रोजी रोटी की जुगाड़ में गुजरात चले गये थे.प्रत्येक घर मे कुछ बच्चे और वृद्ध थे जो घर से जाने मे असमर्थ थे. शाम के लगभग 4 बजे रत्ना झोपड़ी के बाहर बैठकर सूप में धान साफ कर रही थी पास ही उसका 2 माह का बच्चा खाट पर सोया हुआ था.कल ही उसका पति कालू गुजरात से लगभग 6 माह बाद लौटा था,रत्ना को इसलिए नही ले गया था क्योकी वह गर्भवती थी.

वहाँ से मज़दूरी के पैसे इकट्ठे कर अपने बच्चो को देखने और 2-4 दिन रुककर जो साहूकार का उधार था उसे जमा कर रत्ना को अपने साथ ले जाने की कालू की योजना थी. अनायास मोटर साइकिल की आवाज सुनकर रत्ना चौंक पड़ी, उसने देखा की दो पुलिस वाले मोटर साइकिल खड़ी कर उसकी ओर बड़ रहे है. एक बड़ी बड़ी मूँछों वाला मोटा सा शायद हवलदार था और साथ मे एक सिपाही. सिपाही ने पास आकर कहा- क्यो री तेरा आदमी कहाँ है?औरत ने कहा साब वो तो खेत तरफ गया है. सिपाही बोला अरे बैठी क्या है, खड़ी हो, साब से बात कर, बता कल तेरा आदमी कहाँ था ? रत्ना बोली साब वो तो काम पर गुजरात गया था कल ही आया है और अभी खेत देखने और गाँव वालो से मिलने गया है. हवलदार ने कहाँ कि- मिलने गया है या छुपा बैठा है. सिपाही देखो साली ने घर मे ही छुपा रखा हो तलाशी लो सालों की. सिपाही घर मे घुस गया तलाशी लेता रहा बाहर निकला तो बोला साब कालू तो नही है पर 15000/- रुपया घर में से मिला है. लगता है ये उसी सेठ का है जिसकी हत्या की है. रत्ना बोली साब ये तो मेरा आदमी गुजरात से कमाई करके लाया है उसने किसी को लूटा नही है,किसी को मारा नही है, साब हम गरीब लोग है आपके हाथ जोड़ती हूँ साब हमको छोड़ दो. हवलदार बोला - चुप साली कुत्ति जुबान चलाती है तुझे मालूम है आगे रास्ते मे सेठ रामधन की लाश मिली है और उसके रुपए भी किसी ने लूट लिए है. गाँव मे कालू ही का पता लगा है जो साला कल से दारु पी रहा है और ऐश कर रहा है. उसी ने सेठ को मारकर लूटा है. रत्ना रो कर गिरगिराने लगी. इसी बीच कालू घर आया, पुलिस को देख घबराया व अज्ञात भय से वापस जाने लगा तभी सिपाही ने उसे पकड़ लिया, बोला साब ये भाग रहा था इसे पकड़ लिया है इसी ने हत्या की है साब. कालू बौखलाया खड़ा था किसकी हत्या कैसी हत्या वह समझ नही पा रहा था.तभी हवलदार ने लाठी से उसकी पिटाई शुरु कर दी. बता साले जिस हथियार से मारा था वो हथियार कहाँ है ? रुपए तो हमने बरामद कर लिए है. कालू याचना करता रहा नही साहब मैंने नही मारा, रुपये तो मै मज़दूरी करके लाया हूँ. साब मै किसी को क्यों मारुंगा,मेरी क्या दुश्मनी साब. हवलदार चिल्लाया - दुश्मनी , साले तु गुजरात गया जवान औरत को घर छोड़ गया. सेठ से लग गई होगी तूने देखा तो वार कर दिया और लूट लिया. नही साब मेरी औरत ऐसी नही है. अरे कैसी है वो तो दिख रही है. ऐसा कह कर हवलदार ने एक वहशि नजर औरत पर डाली और सिपाही से बोला ले चलो दोनो को. दोनो रोते रहे याचना करते रहे लेकिन उनकी एक न मानी. रत्ना अपने बच्चे को छाती से चिपकाए रोती खींची चली जा रही थी.साथ ही कालू को मारते हुए वे उन्हे थाने ले गए.

थाने पर सफाई हो रही थी. कल 15 अगस्त थी 61 वा स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी चल रही थी. हवलदार ने दोनो को थाने के बाहर बैठाया और थाने दार से कहा साहब रामधन के हत्यारे को ले आया हूँ और घर से 10 हजार रुपये ही बरामद किया है सिपाही ने इशारे से पूछा की 10 या 15 तो हवलदार ने सिपाही को चुप रहने का इशारा किया. और थाने दार से बोलने लगा की साहब कालू की औरत का सेठ से संबंध था कालू मज़दूरी पर गुजरात गया था कल जब कालू लौटा तो उसने उसकी औरत को सेठ के साथ पाया बस फिर क्या था कालू ने सेठ का काम तमाम कर दिया और 10 हजार रुपये लूट लिए. थानेदार ने कहा की रुपये कहा है हवलदार ने वो रुपये निकालकर दिये.फिर थानेदार ने कुटिल हँसी के साथ पूछा और सेठ की वो रखैल कहाँ है ? तो हवलदार बोला अरे साहब उसे भी लाया हूँ बड़ी मस्त चीज है.थानेदार ने कालू को भद्दी गाली देकर सिपाहीओ से धुलाई करवाई फिर थाने के एक कमरे में बंद करके पटक दिया. रत्ना थानेदार के पैरो मे गिरकर अपने पति के प्राणों की भीख मांगने लगी. थानेदार ने उसे हाथ पकड़ कर उठा लिया तथा कहा कि बच्चे को कालू को दे दे और तू सामने वाले क्वार्टर मे जाकर सफाई कर. इसी बीच सिपाही शराब की बॉटल लेकर आ गया. हवलदार व थानेदार शराब पीने लगे.थोड़ी देर मे थानेदार क्वार्टर मे गया दरवाजा बंद कर दिया अंदर से रत्ना के चिखने की आवाजे सुनाई देती रही हवलदार और सिपाही हँस- हँस कर शराब का मजा लेते रहे. आधे घंटे बाद थानेदार क्वार्टर से बाहर आया तो हवलदार क्वार्टर मे चला गया. ये सिलसिला रात भर चलता रहा.

सुबह थानेदार साहब जल्दी तैयार हो गये उन्हे स्वतंत्रता दिवस की सलामी लेना था झंडा फहराना था देश क 61 वा स्वतंत्रता दिवस था.वो जल्दी जल्दी तैयार हो रहे थे तभी कुशलपुर गाँव का चौकीदार रामलाल आया और बोला साब दगरु बदमाश पास के गाँव मे दारु पीकर मारपीट कर रहा था. लोगो ने पकड़ लिया उसके पास से 50000/- रुपये और रामधन सेठ के गले का हार भी मिला है , वह छुरा भी उसके पास है जिससे उसने हत्या की थी, लोग बैलगाड़ी मे बांधकर उसे ला रहे है. थानेदार बोला शाबाश उसे जल्दी लाओ साले को बंद कर दो.लोग दगरु को लाए थानेदार ने उसे बंद कर दिया और कालू को छोड़ा,उसकी औरत को अधमरी सी उसके साथ धकेल दी, और थानेदार बोला की ये तो गनीमत है की दगरु पकड़ा गया वरना तेरी जिंदगी खराब हो जाती चल अब जा भाग यहा से, कालू बोला साहब मेरे पैसे - तो थानेदार बोला काहे के पैसे तु क्या करोड़पति है जो घर में हजारो रुपये रखता है चला जा यहा से वरना यही सड़ता रहा जायेगा . रत्ना बच्चे को लेकर कालू का हाथ पकड़ अपनी फटी साड़ी सम्हाले उसी गाँव की बैलगाड़ी मे बैठ गयी जिसमें दगरु को लोग लाए थे.

स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था किसी नेता का भाषण हो रहा था अब यहा किसी के साथ जुल्म नही हो सकता है हम आजाद है, अपनी रक्षा के लिए कानून है, हमारे सिपाही है,मानव आयोग है,महिला आयोग है. रत्ना ये सुन रही थी साड़ी से पेट छुपाती तो पीट दिखती और पीट छुपाती तो पेट दिखता. पास जाते बच्चे झंडे लेकर गाना गा रहे थे सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा. एक बच्चे के हाथ से झंडा उड़कर रत्ना के उपर जा गिरा रत्ना ने झंडे से अपना बदन ढका, दुर कहीं संगीत गूँज रहा था जहा डाल डाल पर सोने कि चिड़िया करती है बसेरा, और कालू रत्ना से पूछ रहा था कि हम तो लूट गये शाम को खायेंगे क्या ? तभी थानेदार की गाड़ी सलामी देकर लौटी उन्हे देख रत्ना घबराकर बेहोश हो गयी. गाड़ी धीरे धीरे कुशलपुर जा रही थी देश 61 वा स्वतंत्रता दिवस मना रहा था.

प्रेषक

मोनिका दुबे

मीठे बोल बोलिए


व्यक्ति के अच्छे कर्म व अच्छे विचार ही उसे समाज में विशेष स्थान दिलाते हैं. आपके व्यवहार मे यदि मधुरता है बोली मे मिठास है तो आप हर दिल में अपनी खास पहचान बना लेते है. मधुर व्यवहार ही प्रेम रुपी ताले की चाबी है. समाज मे सम्मान व आदर पाने के लिए आपको अपने व्यवहार मे सौम्यता, शिष्टाचार,सम्मान- भाव, शालीनता व मुस्कान जैसी बाते शामिल करना चाहिए. मीठी बोली से नफरत व तिरस्कार के काँटे भी प्रेम व आत्मियता के फूलों मे बदल जाते है. सही संयम,समझ व संतुलन अपनाकर आप अपना व्यवहार मधुर बना सकते है.

बंदूक की गोली की तरह मुँह से निकले शब्द भी कभी वापिस नही आते. अतः हमेशा सोच समझ कर शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए. सिर आदर मे झुकाने पर ही स्वयं को आदर मिलता है. अतः आदर को अपने व्यवहार मे शामिल करे. अच्छा व्यवहार व मीठी बोली व्यक्ति को आभावान बनाती है.समाज मे अच्छी छबि बनाने के लिये व्यवहार मे मधुरता जरूरी हैं. साथ ही इसमें खुशियों की बहार भी छिपी होती है.

हमेशा सकारात्मक सोच रखना चाहिए इससे व्यवहार मे बदलाव आता हैं. बदले की भावना ईर्ष्या,द्वेष से खुद को दूर रखना चाहिए. किसी दूसरे से यदि आप मधुरता की उम्मीद रखते है तो बदले मे आपको भी उसके साथ मधुरता से पेश आना चाहिए. अच्छे संस्कार ही अच्छा इंसान बनाते है अतः बच्चो को भी बचपन से ही अच्छे व्यवहार की सीख देनी चाहिए. व्यवहार में मिठास लाकर आप वो खुशियाँ पायेंगे जो धन दौलत से नहीं मिलती.

इतिहास गवाह है जब भी बोली का दुरुपयोग किया गया है तब हमें महाभारत जैसे युद्ध का सामना करना पड़ा है राम जी को वनवास भी मंथरा की कटु वाणी से कैकई के मन में ईर्ष्या भर देने से मिला. अतः हमेशा मीठे बोल बोलिए.

मधुर व्यवहार के लिये कुछ खर्च नहीं करना पड़ता है जबकि नफरत और बुरा व्यवहार आपको नष्ट कर देता है.

प्रेषक

मोनिका

रात भर मुझको नींद ही आती नही


रात भर मुझको नींद ही आती नही

गीत सुंदर सा कोयल सुनाती नहीं

मेरे भारत की हालत कहा जायेगी

पूछने पर मेरी माँ बताती नही

रात भर मुझको नींद ही आती नहीं

कश्मीर मे रोज हिंदू मरते रहे ,

जख्म अपनों के हम रोज भरते रहे

देश मे रह विदेशो की तारिफे

अपने लोगो के मुह से ही सुनते रहे

कब तलक चलेगा सिलसिला इस तरह

सरकार देश की बताती नही

रात भर मुझको नींद ही आती नही

कोई नंगा यहा कोई भूखा खड़ा ,

बाड़ मे कुछ मरे कही सूखा पड़ा

कही पानी नही कही समुंदर भरे ,

कोई तर माल में कोई रुखा पड़ा

ये ऊँच नीच की दीवारें कब टूटेगी ,

अर्थनीति हमे ये बताती नही

रात भर मुझको नींद ही आती नही

वीर शिवा, राणा, दुर्गा की हमने सुनी कहानी ,

इस धरती के खातिर दी अनेको ने कुर्बानी

उसी देश मे करते जो अपमान सरस्वती माता का

,कैसे कहेंगे अपने को की वे है हिंदुस्तानी

इन भ्रष्ट बुद्धि को सदबुद्धि कब आयेगी

माँ शारदे मुझे ये बताती नही.

रात भर मुझको नींद ही आती नही

अंत मे मेरी माँ ने मुझसे कहा कि

अब जवानो के कंधों पर सब भार है ,

वे ही इस देश का तारण हार है ,

भ्रष्टाचारो और गद्दारो से मुक्त करने का

तुम पर ही सब भार है,

तुमसे ही सुनहरा बनेगा ये भारत

माँ मेरी दिनभर ये बताती रही.

माँ मेरी दिनभर ये बताती रही.

अधूरा


सामने का बंगला लगभग 1 वर्ष से खाली था, आज वहाँ साफ सफाई हो रही थी. लगता है किसी ने बंगला किराए से ले लिया है. मै शासकीय कार्य से दो दिन शहर से बाहर रहा वापिस लौटा तो अनायास बंगले की तरफ निगाह गई, देखा किसी ने वहाँ डेरा डाल दिया है. घर पत्नी ने बातों बातों मे बताया कि सामने एक वृद्ध दम्पत्ति व उनके साथ एक 4-5 साल की लड़की है. इन्होंने यह बंगला किराए से लिया है. कहा से आए है क्या करते है, कुछ मालूम नहीं, जब से आए है दरवाजा बंद ही रहता है. कालोनी में सभी महिलाएँ इनके बारे में जानने को उत्सुक है, लेकिन किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका. मैने कहा तुम महिलाओं को इसके अलावा कोई और काम भी आता है, मेरी झिड़की सुन पत्नी कमरे से बाहर चली गई और मै निढाल बिस्तर पर सो गया.

सुबह की सैर से लौटा तो अखबार दरवाजे मे पड़ा था, रोज की तरह गैलरी में बैठकर चाय की चुस्की के साथ अखबार पड़ रहा था, एक निगाह सामने वाले बंगले पर गई उसकी खिड़की मे कुछ हलचल थी . मैने देखा एक बच्ची खिड़की से झाँक रही हैं, बहुत खूबसूरत, घुँघराले काले बाल, बड़ी बड़ी आँखें एसी मोहक बच्ची की जो एक बार देखे वो बार बार देखने को लालायित हो. मैने बच्ची को पास आने का ईशारा किया तो वह मुस्कुरा दी मैने फिर कुछ उलटी सीधी हरकतें की तो वो ताली बजाकर हँसने लगी.इससे मेरा हौसला बड़ा और मै इशारों में बच्ची से दोस्ती करने लगा. अचानक पीछे से एक वृद्ध आए शायद वे ही यहा के किराएदार थे. उन्होंने बच्ची को खिड़की से हटाया और जोर से खिड़की बंद कर दी. मैं उनके इस व्यवहार को समझ नही पाया. दूसरे दिन सुबह जब सैर पर निकला तो वे वृद्ध बाहर लॉन में घूम रहे थे मैंने उनसे अभिवादन किया तो उन्होंने कोई प्रति उत्तर नहीं दिया. मै मन ही मन सोच रहा था कैसा खडुस बुड़ा है. किसी से बात ही नही करता. घुम कर वापिस आया तो गैलरी मे पहुच कर सामने वाले बंगले पर निगाह दौड़ाई, बच्ची आज भी वहाँ बैठी थी. मैं फिर उसे इशारा करने लगा प्रति उत्तर मे बच्ची कभी खिलखिलाती कभी ताली बजाती पर जैसे ही वृद्ध दंपती मे से किसी की निगाह उस पर पड़ती वे बच्ची को खींच कर ले जाते व खिड़की बंद कर देते. अब तो जैसे मेरा रोज का क्रम बन गया था. अखबार और चाय के साथ सामने वाली खिड़की की बच्ची भी मेरे सुबह के कार्यक्रम मे शामिल हो गई थी.

पत्नी हमेशा सामने वाले बंगले की दिन भर की कहानी सुनाती रहती थी. ये किसी से मिलते नहीं बोलते नहीं, बच्ची को निकलने नही देते. कालोनी मे सब महिलाए तरह तरह की बाते करती रहती है. आप भी पत करो ना ये लोग कौन है? बच्ची कहाँ से लाए है? मै पत्नी के प्रश्न पर मौन रहा पर मन ही मन मै भी यह सब जानने को उत्सुक था.

सामने वाले किराएदार को आए 6 माह हो गए लेकिन कोई उनके बारे में जान नही पाया. वे दैनिक सामान सब्जी,दूध लेने निकलते लेकिन किसी से बात नही करते. कालोनी मे भी किसी से उनका संबंध नही था. रोज शहर जाते थे तथा उनके जीवन उपयोगी सामान लेकर शायद लौट आते है ऐसा अनुमान कालोनी वालो का था.

रोज की तरह मैं आज गैलरी मे आया लेकिन आज सामने कि खिड़की बंद थी. बच्ची नजर नही आई मैने अनुमान लगाया कि शायद ये लोग बाहर गए होंगे इसलिए मैंने नीचे आकर देखा बंगले का दरवाजा खुला था मतलब वे घर पर ही थे पर बच्ची के नजर नही आने से मुझे लगा की आज मुझे सुबह की चाय और अखबार के साथ जो रोज लगता है वो मुझे नही मिला.

थोड़ी देर मे वृद्ध को बाहर जाते देखा वे तेजी से कालोनी की दाई तरफ निकले और 5-7 मिनट बाद एका टैक्सी लेकर लौटे. मै उत्सुकता से देखने लगा. घर से दम्पत्ति बच्ची को गोदी मे उठाए एक बैग लेकर टैक्सी में बैठे. बच्ची उदास लग रही थी शायद बीमार थी और वे उसे अस्पताल ले जा रहे थे मैने चाहा कि उनकी मदद करु पर संकोचवश कुछ कह नही पाया और टैक्सी आँखों से ओझल हो गई.

चार दिन तक बंगला सुना था, किसी को कोई जानकारी नही थी. पाँचवें दिन अस्पताल की वेन और उसके पीछे दो तीन कारे देख मै चौक गया. मैने देखा अस्पताल कि वेन से सफेद चादर मे लिपटा शव निकला. अस्पताल कर्मचारी शव को बाहों मे उठाए घर मे ले जा रहे थे और वृद्ध दम्पत्ति रोते हुये कुछ लोगो के साथ बंगले के अंदर जाते दिखे.

मै समझ गया कि बच्ची नहि रही लेकिन इतनी अच्ची बच्ची कैसे मर सकती है. मेरा मन इस बात को स्वीकार नही कर पा रहा था. शव दफनाने की तैयारी मे साथ आए लोग लगे थे. मै भी इस नाते कि दम्पत्ति का व्यवहार कैसा भी रहा हो पर मेरा उस बच्ची से अनजान रिश्ता हो गया था वहा जाने का मना बना चुका था.पत्नी ने कुछ पूछना चाहा पर मैं बग़ैर कुछ कहे सामने के बंगले पर पहुच गया. वहा वृद्ध दम्पत्ति और साथ के लोग सभी खामोश थे और बच्ची के अंतिम संस्कार कि तैयारी मे थे मै भी उनके काम मे हाथ बटाने लगा. एक अजीब सुनापन था. कोई किसी से बोल नही रहा था थोड़ी देर मे शव को लेकर हम लोग पास के श्मशान गए जहाँ उसे दफनाया गया. और उदास खामोश सभी वापिस आ गए. 2 मिनट बंगले पर रुक मै बाहर आया तो एक व्यक्ति जो शव दफनाने मे शमिल थे मुझसे बोले कि क्या मै आपके मोबाईल का उपयोग कर सकता हूँ. मैने कहाँ क्यो नहीं. यह कह मैने अपना मोबाइल उनकी और बड़ा दिया. उन्होंने मोबाईल पर किसी से बात की और मुझे मोबाईल लौटाकर धन्यवाद दिया. मैने कहा इसकी कोई आवश्यकता नही है मै सामने वाले ही बंगले मे रहता हूँ अपना परिचय दिया व उन्हें चाय के लिए बुलाया. वे भी थके थे और वृद्ध दम्पत्ति के यहाँ कोई नही था जो चाह आदि बना सके. इस कारण वे मेरा आग्रह नही टाल सके मैं उन्हें साथ लाया व बंगले के लॉन मे लगी कुर्सी पर हम बैठ गए.मैने चाय के लिए पत्नी को आवाज लगाई. मै अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहता था. मैने उनसे सामने वाले दम्पत्ति के बारे मे पूछा उन्होंने जो बताया उसे सुनकर मै अपने आप से ग्लानि करने लगा . उन्होने कहा कि इनका लड़का फौज मे कर्नल था. जो लद्दाख मे तैनात था. लखनऊ मे इनका अपना घर है, जहाँ ये वृद्ध दम्पत्ति अपनी बहू के साथ रहते थे एक दिन इनका बेटा लद्दाख से लौटा तो बीमार था. सेना के डॉक्टरों ने बताया कि उसे एड्स हो गया है, इसी एड्स कि बीमारी में 1 वर्ष मे इनका बेटा मर गया, उसी वर्ष इनके यहा पोती का जन्म हुआ, लेकिन चिकित्सकों ने बताया कि इनकी पोती व बहू भी एड्स के शिकार हो चुके हैं, 3 वर्ष तक लड़ती हुई इनकी बहू भी मौत के आगोश मे चली गई. रह गए ये वृद्ध दम्पत्ति और वो बच्ची. मोहल्ले के लोग इन्हें अछूत मानते इन पर फिकरे कसते, और इन्हें जलील करते. बच्ची को कोई पास नही बिठाता, इस जलालत से बचने के लिए इन्होंने शहर छोड़ दिया और दूर इस अनजान शहर मे आ गए यहाँ किसी से संपर्क इसलिए नही किया कि फिर नही अपमान और नफरत की निगाह से उन्हें देखा जाएगा. आज उनके बेटे कि आखरी निशानी भी चली गई. ये सुन मै सन्न रह गया. मै क्या क्या सोचता था इस दम्पत्ति के बारे में लेकिन वे इस तरह का आचरण क्यो कर रहे थे यह आज जान पाया. मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था मै उस दम्पत्ति से क्षमा माँगना चाहता था तथा भविष्य मे कोई सहयोग चाहिए तो मै मदद के लिए तैयार हूँ ऐसा आश्वासन देना चाहता था. लेकिन दुसरे दिन सुबह मैंने देखा कि बंगला खाली है शायद वे रात को ही कही ओर चले गये थे. सामने बंद खिड़की थी जिस पर सूरज कि पहली किरण गिर रहीं थी उस किरण मे ऐसा लग रहा था कि बच्ची खिलखिला कर हँस रही है ताली बजा रही है.मै अखबार और चाय के बाद आज मिलने वाले सुकून से अधूरा रह गया था.

प्रेषक मोनिका दुबे