बुधवार, 24 सितंबर 2008

अधूरा


सामने का बंगला लगभग 1 वर्ष से खाली था, आज वहाँ साफ सफाई हो रही थी. लगता है किसी ने बंगला किराए से ले लिया है. मै शासकीय कार्य से दो दिन शहर से बाहर रहा वापिस लौटा तो अनायास बंगले की तरफ निगाह गई, देखा किसी ने वहाँ डेरा डाल दिया है. घर पत्नी ने बातों बातों मे बताया कि सामने एक वृद्ध दम्पत्ति व उनके साथ एक 4-5 साल की लड़की है. इन्होंने यह बंगला किराए से लिया है. कहा से आए है क्या करते है, कुछ मालूम नहीं, जब से आए है दरवाजा बंद ही रहता है. कालोनी में सभी महिलाएँ इनके बारे में जानने को उत्सुक है, लेकिन किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका. मैने कहा तुम महिलाओं को इसके अलावा कोई और काम भी आता है, मेरी झिड़की सुन पत्नी कमरे से बाहर चली गई और मै निढाल बिस्तर पर सो गया.

सुबह की सैर से लौटा तो अखबार दरवाजे मे पड़ा था, रोज की तरह गैलरी में बैठकर चाय की चुस्की के साथ अखबार पड़ रहा था, एक निगाह सामने वाले बंगले पर गई उसकी खिड़की मे कुछ हलचल थी . मैने देखा एक बच्ची खिड़की से झाँक रही हैं, बहुत खूबसूरत, घुँघराले काले बाल, बड़ी बड़ी आँखें एसी मोहक बच्ची की जो एक बार देखे वो बार बार देखने को लालायित हो. मैने बच्ची को पास आने का ईशारा किया तो वह मुस्कुरा दी मैने फिर कुछ उलटी सीधी हरकतें की तो वो ताली बजाकर हँसने लगी.इससे मेरा हौसला बड़ा और मै इशारों में बच्ची से दोस्ती करने लगा. अचानक पीछे से एक वृद्ध आए शायद वे ही यहा के किराएदार थे. उन्होंने बच्ची को खिड़की से हटाया और जोर से खिड़की बंद कर दी. मैं उनके इस व्यवहार को समझ नही पाया. दूसरे दिन सुबह जब सैर पर निकला तो वे वृद्ध बाहर लॉन में घूम रहे थे मैंने उनसे अभिवादन किया तो उन्होंने कोई प्रति उत्तर नहीं दिया. मै मन ही मन सोच रहा था कैसा खडुस बुड़ा है. किसी से बात ही नही करता. घुम कर वापिस आया तो गैलरी मे पहुच कर सामने वाले बंगले पर निगाह दौड़ाई, बच्ची आज भी वहाँ बैठी थी. मैं फिर उसे इशारा करने लगा प्रति उत्तर मे बच्ची कभी खिलखिलाती कभी ताली बजाती पर जैसे ही वृद्ध दंपती मे से किसी की निगाह उस पर पड़ती वे बच्ची को खींच कर ले जाते व खिड़की बंद कर देते. अब तो जैसे मेरा रोज का क्रम बन गया था. अखबार और चाय के साथ सामने वाली खिड़की की बच्ची भी मेरे सुबह के कार्यक्रम मे शामिल हो गई थी.

पत्नी हमेशा सामने वाले बंगले की दिन भर की कहानी सुनाती रहती थी. ये किसी से मिलते नहीं बोलते नहीं, बच्ची को निकलने नही देते. कालोनी मे सब महिलाए तरह तरह की बाते करती रहती है. आप भी पत करो ना ये लोग कौन है? बच्ची कहाँ से लाए है? मै पत्नी के प्रश्न पर मौन रहा पर मन ही मन मै भी यह सब जानने को उत्सुक था.

सामने वाले किराएदार को आए 6 माह हो गए लेकिन कोई उनके बारे में जान नही पाया. वे दैनिक सामान सब्जी,दूध लेने निकलते लेकिन किसी से बात नही करते. कालोनी मे भी किसी से उनका संबंध नही था. रोज शहर जाते थे तथा उनके जीवन उपयोगी सामान लेकर शायद लौट आते है ऐसा अनुमान कालोनी वालो का था.

रोज की तरह मैं आज गैलरी मे आया लेकिन आज सामने कि खिड़की बंद थी. बच्ची नजर नही आई मैने अनुमान लगाया कि शायद ये लोग बाहर गए होंगे इसलिए मैंने नीचे आकर देखा बंगले का दरवाजा खुला था मतलब वे घर पर ही थे पर बच्ची के नजर नही आने से मुझे लगा की आज मुझे सुबह की चाय और अखबार के साथ जो रोज लगता है वो मुझे नही मिला.

थोड़ी देर मे वृद्ध को बाहर जाते देखा वे तेजी से कालोनी की दाई तरफ निकले और 5-7 मिनट बाद एका टैक्सी लेकर लौटे. मै उत्सुकता से देखने लगा. घर से दम्पत्ति बच्ची को गोदी मे उठाए एक बैग लेकर टैक्सी में बैठे. बच्ची उदास लग रही थी शायद बीमार थी और वे उसे अस्पताल ले जा रहे थे मैने चाहा कि उनकी मदद करु पर संकोचवश कुछ कह नही पाया और टैक्सी आँखों से ओझल हो गई.

चार दिन तक बंगला सुना था, किसी को कोई जानकारी नही थी. पाँचवें दिन अस्पताल की वेन और उसके पीछे दो तीन कारे देख मै चौक गया. मैने देखा अस्पताल कि वेन से सफेद चादर मे लिपटा शव निकला. अस्पताल कर्मचारी शव को बाहों मे उठाए घर मे ले जा रहे थे और वृद्ध दम्पत्ति रोते हुये कुछ लोगो के साथ बंगले के अंदर जाते दिखे.

मै समझ गया कि बच्ची नहि रही लेकिन इतनी अच्ची बच्ची कैसे मर सकती है. मेरा मन इस बात को स्वीकार नही कर पा रहा था. शव दफनाने की तैयारी मे साथ आए लोग लगे थे. मै भी इस नाते कि दम्पत्ति का व्यवहार कैसा भी रहा हो पर मेरा उस बच्ची से अनजान रिश्ता हो गया था वहा जाने का मना बना चुका था.पत्नी ने कुछ पूछना चाहा पर मैं बग़ैर कुछ कहे सामने के बंगले पर पहुच गया. वहा वृद्ध दम्पत्ति और साथ के लोग सभी खामोश थे और बच्ची के अंतिम संस्कार कि तैयारी मे थे मै भी उनके काम मे हाथ बटाने लगा. एक अजीब सुनापन था. कोई किसी से बोल नही रहा था थोड़ी देर मे शव को लेकर हम लोग पास के श्मशान गए जहाँ उसे दफनाया गया. और उदास खामोश सभी वापिस आ गए. 2 मिनट बंगले पर रुक मै बाहर आया तो एक व्यक्ति जो शव दफनाने मे शमिल थे मुझसे बोले कि क्या मै आपके मोबाईल का उपयोग कर सकता हूँ. मैने कहाँ क्यो नहीं. यह कह मैने अपना मोबाइल उनकी और बड़ा दिया. उन्होंने मोबाईल पर किसी से बात की और मुझे मोबाईल लौटाकर धन्यवाद दिया. मैने कहा इसकी कोई आवश्यकता नही है मै सामने वाले ही बंगले मे रहता हूँ अपना परिचय दिया व उन्हें चाय के लिए बुलाया. वे भी थके थे और वृद्ध दम्पत्ति के यहाँ कोई नही था जो चाह आदि बना सके. इस कारण वे मेरा आग्रह नही टाल सके मैं उन्हें साथ लाया व बंगले के लॉन मे लगी कुर्सी पर हम बैठ गए.मैने चाय के लिए पत्नी को आवाज लगाई. मै अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहता था. मैने उनसे सामने वाले दम्पत्ति के बारे मे पूछा उन्होंने जो बताया उसे सुनकर मै अपने आप से ग्लानि करने लगा . उन्होने कहा कि इनका लड़का फौज मे कर्नल था. जो लद्दाख मे तैनात था. लखनऊ मे इनका अपना घर है, जहाँ ये वृद्ध दम्पत्ति अपनी बहू के साथ रहते थे एक दिन इनका बेटा लद्दाख से लौटा तो बीमार था. सेना के डॉक्टरों ने बताया कि उसे एड्स हो गया है, इसी एड्स कि बीमारी में 1 वर्ष मे इनका बेटा मर गया, उसी वर्ष इनके यहा पोती का जन्म हुआ, लेकिन चिकित्सकों ने बताया कि इनकी पोती व बहू भी एड्स के शिकार हो चुके हैं, 3 वर्ष तक लड़ती हुई इनकी बहू भी मौत के आगोश मे चली गई. रह गए ये वृद्ध दम्पत्ति और वो बच्ची. मोहल्ले के लोग इन्हें अछूत मानते इन पर फिकरे कसते, और इन्हें जलील करते. बच्ची को कोई पास नही बिठाता, इस जलालत से बचने के लिए इन्होंने शहर छोड़ दिया और दूर इस अनजान शहर मे आ गए यहाँ किसी से संपर्क इसलिए नही किया कि फिर नही अपमान और नफरत की निगाह से उन्हें देखा जाएगा. आज उनके बेटे कि आखरी निशानी भी चली गई. ये सुन मै सन्न रह गया. मै क्या क्या सोचता था इस दम्पत्ति के बारे में लेकिन वे इस तरह का आचरण क्यो कर रहे थे यह आज जान पाया. मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था मै उस दम्पत्ति से क्षमा माँगना चाहता था तथा भविष्य मे कोई सहयोग चाहिए तो मै मदद के लिए तैयार हूँ ऐसा आश्वासन देना चाहता था. लेकिन दुसरे दिन सुबह मैंने देखा कि बंगला खाली है शायद वे रात को ही कही ओर चले गये थे. सामने बंद खिड़की थी जिस पर सूरज कि पहली किरण गिर रहीं थी उस किरण मे ऐसा लग रहा था कि बच्ची खिलखिला कर हँस रही है ताली बजा रही है.मै अखबार और चाय के बाद आज मिलने वाले सुकून से अधूरा रह गया था.

प्रेषक मोनिका दुबे

1 टिप्पणी:

Manish ने कहा…

कुछ कह नही सकता, शब्द ही नही हैं, बस उस बच्ची की एक धुँधली सी तस्वीर बना रहा हूँ।