रविवार, 23 नवंबर 2008

कब तक ?


आज फिर कोई वैदेही को देखने आ रहा था. पूरे घर में साज सजावट और मेहमानों के स्वागत की तैयारियाँ हों रही थी. माँ वैदेही को हर बार की तरह शिक्षा दे रहीं थी __ देख बेटी ये रिश्ता बहुत अच्छे घर से आया हैं इस बार तू कोई नया ड्रामा या हंगामा खड़ा मत करना और वैदेही आशंका और डर से मन ही मन चिंतित हों रही थी. ये कोई नई बात नहीं थी इसके पहले भी वैदेही को कई लड़के देख चुके थे व सभी ने उसे पसंद भी किया था मगर हर बार वैदेही ने इनकार कर दिया. दरअसल वैदेही जब मात्र 8 साल की थी तब किसी अपने ही रिश्तेदार ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया था. यह बात वैदेही के अलावा कोई नहीं जानता था क्योंकि रिश्तेदार ने उसे डरा धमकाकर चुप कर दिया था व किसी से कुछ भी न कहने की हिदायत दी थी. जिसे वैदेही आज भी नहीं भुला पाई थी. उसे पुरुष जाति से नफरत हो गई थी यहीं कारण था कि वैदेही अब शादी नहीं करना चाहती थी.

बचपन की वो घटना याद आते ही वैदेही काँप जाती उसे अब किसी पर भरोसा नहीं रहा. पुरुष जाति केवल नारी को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और बाद में फेंक देते हैं बस यहीं विचार वैदेही के मन में घर कर गए थे. उसका आत्मविश्वास खो चुका था. कहीं भी जाने से डरती थी वैदेही. हर किसी को शक़ की निगाह से देखती थी. मगर हर बार शादी के लिए मना करना और माँ का दिल दुखाना अब वैदेही के लिए मुश्किल था. माँ बार बार वैदेही को समझा रही थी. विनती कर रही थी कि इस बार अपनी विधवा माँ का मान रख लेना और लड़के वालों के सामने अच्छी तरह पेश आना और हों सके तो माँ के लिए ही सही इस बार हाँ कह देना. वैदेही अनेक तरह की आशंकाओं से घिरी हुईं लड़के वालों के सामने खड़ी थी. हर बार की तरह इस बार भी लड़के वालों ने वैदेही को देखते ही पसंद कर लिया और हाँ कह दी. वैदेही ने भी माँ की चिंता को कम करने का सोच हाँ कह दिया. शादी की तैयारियाँ शुरु हुई और वो दिन आया जब वैदेही घर से विदा हुई. माँ वैदेही से लिपट कर खूब रोई लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे जो विदाई के दुख से अधिक गहरे थे. ससुराल में सभी ने वैदेही का बहुत अच्छे से स्वागत किया. धन की कोई कमी न थी आलीशान कोठरी और नौकर चाकर थे.

पर वैदेही को ये सब वैभव की चाह न थी वह तो आज तक जिस सोच जिस डर में जी रहीं थी उससे बाहर आना चाहती थी. पर वैदेही को यहाँ भी किस्मत ने दगा दिया उसके पति ने सिर्फ उसकी खूबसूरती देख उससे शादी की थी उसकी भावनाओं के लिए पति के दिल में कोई जगह न थी. वैदेही पहली ही रात अपने पति की जबरदस्ती का शिकार हुई और ये सिलसिला अब आम होता गया.पहले से ही आहत वैदेही मन हि मन घुटने लगी पर अपने दिल की व्यथा किससे कहें. सब कुछ चुपचाप सहन कर वैदेही मात्र एक शरीर बन गई जिसकी आत्मा बहुत पहले मर चुकी थी. वैदेही की व्यथा उसके दिल के एक कोने में बंद होकर रह गई जो कभी बाहर न निकल सकीं.

आज कितनी ही ऐसी वैदेही हैं समाज में जिन्हें किसी अपने ने छला हैं जो किसी अपने की ही हवस का शिकार बनी और जिंदगी भर के लिए मौन हों गई. ऐसी कई वैदेही जो पुरुष वर्ग से घृणा करती हैं जिन्हें अब किसी पर भरोसा नहीं. जिनकी जिंदगी पल भर में तबाह हों गई. आए दिन समाचार पत्रों में बलात्कार दुराचार की खबरें आती हैं. ज्यादातर को अपनों ने ही शिकार बनाया हैं. कही मज़बूरी में काम कर रही नौकरानी के साथ तो कभी मासूम बच्ची के साथ दुराचार किया जाता हैं.

मैं सवाल करती हूँ पुरुष वर्ग से क्या नारी का आत्मसम्मान, भावनाएँ, उसकी इच्छाए कोई मायने नहीं रखती? क्या नारी एक शरीर मात्र हैं? आधुनिकता का चोला पहने लोग भी नारी को वस्तु समझते हैं. कितनी ही नारियों को उनके पति ने ही शिकार बनाया कितनों को देवर, जेठ, या किसी रिश्तेदार ने. ? कहाँ खो गया हैं हमारा जमीर हमारे संस्कार? क्यों हमारी सोच इतनी गंदी हों गई हैं? हमारे देश में नारी को देवी माना गया वहीं दूसरी और इस तरह मात्र दिखावे की वस्तु समझ कर उपयोग किया गया. मात्र कुछ क्षण का आनंद पुरुष को इतना अंधा बना देता हैं कि उसका विवेक ही मर जाता हैं? आखिर क्यों? और कब तक.........????

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

4 टिप्‍पणियां:

नारदमुनि ने कहा…

jab tak yah duniya hai. narayan narayan

panchayatnama ने कहा…

शिक्षा ही एक ऐसी चीज है, जो कि कुछ हद तक इसका हल है. वैदेही की कहानी जो आपने सुनाई है, वो कुछ समय पहले तक तो पता भी नहीं चलती थी. अब तो कम से कम तमाम ऐसे जरिये हैं, कि ये सब बातें सामने आ रही हैं.

वैसे जब मैं आपकी कहानी पढता हूँ, तो मैं कहूँगा कि वैदेही को अपना वर चुनते समय सिर्फ़ अपनी माँ के लिए ही शादी के लिए हाँ नहीं कर देना चाहिए था. आख़िर ठीक है, कि उसके साथ बचपन में कुछ ग़लत हुआ. पर जरा उसको सोचना चाहिए था, कि इस दुनिया में उससे भी बड़े कई गम है. अपने दिमाग से उसको वो निकल देना चाहिए था. पर उसने क्या किया? उस बीज को एक पौधे के रूप में तैयार किया. परिणाम - उसकी ख़ुद की बुद्धि ख़राब हो गई.. इतनी ख़राब कि उसने अपना जीवन साथी भी ..... वरना उसको करना ये चाहिए था, कि मानसिक रूप से अपने को तैयार करे.

याद रखें, कि कोई नस्ल, जात, धर्म या पुरूष या नारी जाति में दोष नहीं होता है... हमें अपने को तैयार.. सावधान और सुरक्षित रखने की जरूरत है.. वरना मैं भी @नारद जी से सहमत हूँ... ये कभी ख़त्म नहीं होगा...

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Voice Of The People ने कहा…

ऐसी वैदेही इस समाज में और भी बहुत हैं इस वासना से
भरे संसार में यह मां बाप का रार्ज़ है की लड़की को किसी मर्द के साथ अकेला न छोड़ें. ऐसे मर्द दिमाग़ी तौर पे बीमार हुआ करते हैं.