शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

कलम...?


असंतुष्ट हूँ, चिंतित हूँ, परेशान हूँ, कश्मकश में हूँ. बहुत दिनों से लिखने का प्रयास कर रही हूँ मगर जब भी कलम हाथ में लेती हूँ विचार आता है कि क्या मेरी कलम अपना उद्देश्य निभा रही हैं? क्या मेरी आवाज वहा पहुँच रही है जहाँ में पहुँचाना चाहती हूँ.
बम ब्लास्ट हों रहे हैं.देश में उथला पुथल मचा हैं. कई लोगों ने लिखा चर्चा की और भूल गए........ मै नहीं भूल पा रहीं हूँ. मै शायद दिल से सोचती हूँ और दिल से ही लिखती भी हूँ तभी मुझे शायद एक अच्छे पत्रकार की तरह लिखना नही आता तभी मुझे चंद प्रतिक्रियाओं और लेखन से शान्ति नहीं मिलती.........??

कितने ब्लॉग हैं और कितने सारे लोग रोज लिखते हैं और बस लिखते ही रहते हैं. देश पर राजनीति पर अर्थव्यवस्था पर और न जाने कितने विषयों पर रोज लिखा जाता हैं लेकिन इन सबका कितना असर हों पाता हैं? कितने लोग है जो न केवल पढ़ते हैं,अमल भी करते हैं? समझ नही पा रहीं हूँ कि मैं कलम से क्या चाहतीं हूँ मुझे मेरे लेखन का उद्देश्य नहीं मिल रहा कही खो गया हैं बहुत खोजा मिला नहीं क्या कोई मुझे बताएगा की आज के समय में कलम का उद्देश्य क्या होगा? या क्या होना चाहिए?

बस आज इतना ही आपको मेरे सवालों का जवाब मिलें तो मुझे बताइए.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

5 टिप्‍पणियां:

Pawan Nishant ने कहा…

मोनिका जी, एक होता है सूझबूझ का लेखन, लेकिन उससे पहले अनगढ़ लेखन ही होता है। बस लिखते जाओ, लिखते जाओ, सभी की शुरूआत ऐसे ही होती है। तड़प जितनी पकेगी, लेखन उतना ही निखरेगा, इसलिए लिखने से पहले तड़पना जरूरी है। जितनी देर तड़पेंगे, उतना पका लिख सकेंगे। आपके लिए किसी गीतकार की यह रचना, मेरे ब्लाग का टाइटल भी इसी से लिया गया है-
हिम्मत भी है डर भी है, अब देखें क्या हो रस्ते में
हिम्मत अपनी मंजिल पा लेगी, या मेरा डर लौटेगा।

abhivyakti ने कहा…

monika ji kalam ek vichar ko janm deti hai aur vichar hi vyakti ya samaj ko mool roop se parivartit karte hain .aatankwad bhi ek vichar ki hi den hai ,apki kalam apne vicharo se samaj ka shodhan kar sakti hai bhale hi thoda samay lage.
-dr.jaya

Udan Tashtari ने कहा…

बिना लिखे तो कुछ भी हासिल नहीं..लिख कर एक उम्मिद तो है कि बात कहीं तो पहुँचेगी.

Dr.Parveen Chopra ने कहा…

समीर लाल जी ठीक फरमा रहे हैं। इसलिये आप भी निरंतर लिखती रहिये --- सवालों के जवाब अपने आप मिलने शुरू हो जायेंगे।
और जहां तक लिखने से होने वाले प्रभावों की बात है ---
इन परिंदों को भी मिलेगी मंज़िल एक दिन,
ये हवा में खुले इन के पंख बोलते हैं।

आप की पोस्ट पढ़ कर बहुत अच्छा लगा, सच्चे मन से खुल कर लिखी हुई पोस्ट !!

प्रशांत दुबे ने कहा…

aap likhte rhiye aur dekhiye aap ek din eisi rachnaa likh dengi ki sab kahenge wah wah kya ikha hai