शुक्रवार, 11 मार्च 2016

बांझ
इस बार भी डॉक्टर के क्लिनिक से हताश होकर लौट रही शुभ्रा ने अब संतान होने की सारी उम्मीद छोड़ दी थी. विवाह के १० वर्ष हो जाने के बाद भी संतान का सुख न मिल सकने से वो अंदर ही अंदर टूट रही थी और उसकी इस निराशा का सबसे बड़ा कारण थे उसके पास पड़ौसी और नाते रिश्तेदार जो उसे बांझ और अशुभ मानते थे तरह तरह के ताने देते थे. जो भी उससे मिलता या बात करता वो उसे संतानोत्पत्ति के उपाय बताता टोने टोटके और तावीज़ की जानकारी देता. जिसमें सबसे अग्रणी थी शुभ्रा की पड़ौसी मिसेज़ वर्मा जो एक संपन्न परिवार की थी और उनके ३ बेटे थे. मिसेज़ वर्मा शुभ्रा को बड़ी शान से कहती थी की मेरे ३ बेटे हें मेरी कोख पर कोई दाग नहीं हैं. और एक औरत संतान के बिना अधूरी हैं .सूखे पेड़ के समान हे जिसमें कोई फल नहीं हैं. शुभ्रा को आस पास मे कहीं गोद भराई या सूरज पूजा की रस्म में नहीं बुलाया जाता था क्योकि पड़ौसी मानते थे की उसके आने से गोद भराई के कार्य मे बाधा होंगी. कुछ लोग अपने बच्चों को भी शुभ्रा के पास नहीं फटकने देते थे उन्हे लगता था की उनके बच्चो को शुभ्रा की नज़र लग जाएगी.
शुभ्रा मन ही मन बहुत दुखी होती और ईश्वर को इस अन्याय के लिए कोसती रहती. इसी तरह समय बीत रहा था. एक बार शुभ्रा किसी ज़रूरी कार्य से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गयी हुई थी जब वो वापिस घर लौटी तो उसे पता चला की उसके पड़ौसी मिस्टर वर्मा का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया हैं. उसे लगा की पड़ौसी होने के नाते उसे भी वर्मा परिवार की इस दुख की घड़ी मे उन्हें धीरज बंधाने जाना चाहिए. वो वर्मा परिवार के घर पहुँची तो उसने देखा की तीनो बेटे और बहुए जायदाद के हिस्से को लेकर एक दूसरे से बहस कर रहे हैं और मिसेज़ वर्मा एक कोने मे सर पकड़ कर बैठी हैं उन्हे तीनों ही बेटे अपने साथ नहीं रखना चाहते अंत मे उन्होने अपनी माँ को विधवा आश्रम भेजनें का निर्णय लिया.मिसेज़ वर्मा शुभ्रा को देख फफक पड़ी दौड़ कर गले से लिपट गयी और फूट फूट कर रोने लगी कहने लगी की शुभ्रा आज मैं पूरी दुनिया में बिल्कुल अकेली हो गयी हूँ कहने को मेरे ३-३ बेटे हैं पर आज मुझे सहारा देने वाला कोई नहीं एसी संतान से तो बांझ होना अच्छा.शुभ्रा मिसेज़ वर्मा को गले से लगा धीरज बँधा रही थी और मन ही मन सोच रहीं थी की ईश्वर ने उसे संतान नहीं दी इस बात के लिए वो उन्हे कोसे या शुक्रिया अदा करें वो बांझ हैं ये उसके लिए अभिशाप हैं या ईश्वर का दिया वरदान.
मोनिका भट्ट

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