सोमवार, 19 जनवरी 2009

मेरी दादी


जब मैं छोटी थी तब तुम मुझे खोज लिया करती थी छुप जाने पर और अपनी गोद में बिठाकर ढेर सारे किस्से कहानियाँ सुनाती थी. बाबूजी जब गुस्सा होते तो तुम झट बच्चों की तरफदारी करती चाहें बाबूजी लाख नाराज हों.

पास पड़ोस की तुम अकेली ही वैद्य थी तुम्हारे पास हर बीमारी के लिए एक राम बाण औषधि होती थी. गाँव में किसी के घर बच्चे का जन्म होने वाला हों तो तुम ही थी जो क्या करना चाहिए क्या नहीं वो बताती थी. किसी के यहाँ विवाह तुम्हारे बिना संभव न था क्योकि सारे रस्मो रिवाज तो तुम्हें ही पता थे. चाहें वो मंडप, माता पूजन हों या बन्ना बन्नी गाना हों तुम सबसे अनमोल थी. घर में यदि कथा हों रही हैं तो पंडित जी को बार बार हिदायत देती थी तुम और पंडित की मजाल जो तुम्हारी बात से टल जाए.

मुझे भी तो कई बार प्यार भरी झिड़की देती थी जब मुझे खाना बनाना नहीं आता था. और माँ पिताजी को फटकार भी पड़ती थी मुझे घर के काम न सिखाने के लिए. एक बार तो तुमने मुझसे हाथ पकड़ कर मक्के की रोटी बनवाई थी. और रोटी जल जाने पर भी तुमने बड़े प्यार से केवल वही रोटी खाईं थी और कहा था की तेरे हाथ की रोटी सबसे अच्छी बनी हैं.
जब स्कूल में मुझे बड़ी क्लास की लड़की ने झगड़ा होने पर मेरी पिटाई की थी तब तुम ही थी जो मेरे लिए उस लड़की को घर जाकर फटकार आई थी. और तो और एक बार टीचर ने होमवर्क न करने पर जब मुझे सजा दी थी और मेरे हाथ सूज कर लाल हों गए थे तो तुमने उस टीचर की वो खबर ली थी कि पूरे स्कूल को हिला दिया था. जब मेरी जॉब लगी थी तब तुम इतनी खुश हुई की पूरे गाँव को पता चल गया था की मै समाचार पत्र में काम कर रहीं हूँ. साथ ही तुम्हें मेरे विवाह की भी चिंता थी जो तुम समय समय पर माँ पिताजी के सामने जाहिर करती थी. जब शादी की तारीख पक्की हुई थी तो तुम खुशी से नाच उठी थी और जमकर तैयारियों में जुट गई थी. जब ढोल बजता था तो तुम खुशी से नाचती थी और मेरी नजर उतारती थी. बिदाई के समय खूब रोई थी और फिर मुझे गाड़ी तक छोड़ने आई और मुझे समझाइश भी दी थी की बिटिया अपने घर का मान रखना और ससुराल में सबको खुश रखना .

तुम मेरे लिए सब कुछ थी माँ पिताजी से मुझे कुछ मनवाने के लिए मैं सदा तुम्हारा सहारा लेती थी. और पिताजी तुम्हारी बात कैसे टालते तुम उनकी माँ जो थी. मेरी दादी थी तुम. और मैं तुम्हारी लाड़ली पोती.

अचानक तुम कहाँ खो गई दादी..? तुम्हें कितना खोजा पर इस बार तुम नहीं मिल रहीं हों. बचपन में तो मैं तुम्हें झट खोज लेती थी और तुम्हारे गले लग जाती थी. पर आज तुम नहीं मिल रहीं हो दादी...? जब पिताजी ने बताया कि तुम हम सबको छोड़ कर चली गई हो तो मुझे लगा जैसे मेरा बचपन चला गया . जो अब तक तुम्हारे होने पर चंचलता थी वो तुम्हारे साथ चली गई. मेरे साथ साथ माँ पिताजी भी बहुत अकेले हों गए हैं दादी.
जब दादाजी हमें छोड़ कर गए थे मैं तुमसे लिपटकर रोई थी पर मुझे तुम्हारा हौसला था अब मैं बहुत अकेली हूँ दादी...... गाँव वाले भी तुम्हें बहुत याद करते है दादी..... तुम क्यों चली गई....? …. दादी मुझे तुम्हारी बहुत याद आती हैं......

प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

कलम...?


असंतुष्ट हूँ, चिंतित हूँ, परेशान हूँ, कश्मकश में हूँ. बहुत दिनों से लिखने का प्रयास कर रही हूँ मगर जब भी कलम हाथ में लेती हूँ विचार आता है कि क्या मेरी कलम अपना उद्देश्य निभा रही हैं? क्या मेरी आवाज वहा पहुँच रही है जहाँ में पहुँचाना चाहती हूँ.
बम ब्लास्ट हों रहे हैं.देश में उथला पुथल मचा हैं. कई लोगों ने लिखा चर्चा की और भूल गए........ मै नहीं भूल पा रहीं हूँ. मै शायद दिल से सोचती हूँ और दिल से ही लिखती भी हूँ तभी मुझे शायद एक अच्छे पत्रकार की तरह लिखना नही आता तभी मुझे चंद प्रतिक्रियाओं और लेखन से शान्ति नहीं मिलती.........??

कितने ब्लॉग हैं और कितने सारे लोग रोज लिखते हैं और बस लिखते ही रहते हैं. देश पर राजनीति पर अर्थव्यवस्था पर और न जाने कितने विषयों पर रोज लिखा जाता हैं लेकिन इन सबका कितना असर हों पाता हैं? कितने लोग है जो न केवल पढ़ते हैं,अमल भी करते हैं? समझ नही पा रहीं हूँ कि मैं कलम से क्या चाहतीं हूँ मुझे मेरे लेखन का उद्देश्य नहीं मिल रहा कही खो गया हैं बहुत खोजा मिला नहीं क्या कोई मुझे बताएगा की आज के समय में कलम का उद्देश्य क्या होगा? या क्या होना चाहिए?

बस आज इतना ही आपको मेरे सवालों का जवाब मिलें तो मुझे बताइए.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

जागो देशवासियों


मुंबई पर हुए आतंकी हमले पर बहुत लिखा जा चुका बहुत सुन लिया और बहुत कह भी लिया मगर जिनकी जान गई जो शहीद हुए उनके लिए कितनों ने बात की हैं..? मीडिया हर पल का सीधा प्रसारण दिखा कर अपने चैनल को तेज सबसे तेज घोषित करने की होड़ में लगा हुआ हैं. राजनीतिक दल हमारे तथाकथित नेता इस समय भी राजनीति करने से नहीं चूकते हैं. एक दूसरे की गलती निकालने एक दूसरे की टाँग खींचने में कोई पीछे नहीं हटना चाहता. सवाल ये हैं कि देश के बारे में कौन सोचेगा..?

हमले में जो शहीद हुए उन्हें शत शत नमन और उन परिवारों को सांत्वना जिन्होंने अपनों को खोया. शायद अब वक्त आ गया हैं जब हमें भारत माँ का ऋण चुकाने को आगे आना होगा. केवल बहस और भाषण से कुछ नहीं होगा समय है उचित रणनीति बनाने का सही कदम उठाने का , कुछ ऐसे ठोस कदम जो आने वाले समय में हमें इतना कमजोर साबित न कर पाए. हमें एकजुट होना होगा और इस आतंक से डटकर मुक़ाबला करना होगा.आपसी झगड़े भूल एकता दिखाने का मिलकर आतंक का सामना करने का वक्त है.

भारत इतना कमजोर कैसे हों सकता हैं कि चंद आतंकवादी पूरे देश को हिला दे ? क्या हमारे देश में इतना सामर्थ्य नहीं की इसका सामना कर पाए ? क्या वीरों की धरती पर वीरों का अकाल हों गया हैं ? हमारी संवेदनाएँ हमारी भावनाएँ कहाँ हैं ?

मीडिया जिसे अपना सही फर्ज निभाना था वो हर खबर को दिखाता रहा और दहशत बढ़ाता रहा. बजाए इसके कि कार्यवाही होने देते व प्रमुख खबरें आम जनता तक पहुँचाई जाती. नेता राजनीति न कर आगे की कार्यवाही पर प्रकाश डालते. कोई भी अपना कार्य ठीक से न कर पाया ?

और हम ? हमने क्या किया ? सुबह की चाय के साथ समाचार पत्र में और न्यूज चैनल में आतंकवादी हमले की खबर की निंदा की ? देश को कोसा ? सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह उठाए ? थोड़ी देर शहीद हुए लोगों के लिए खेद व्यक्त किया और लग गए अपने काम में ? क्या हमें हक हैं देश के नेता को या अन्य को कोसने का ?

मैं नहीं कहतीं की हमारे नेता या सुरक्षा व्यवस्था में कमी नहीं हैं मैं मानती हूँ कमी हैं मगर जरूरत आज खुद कुछ करने की हैं . मेरे कहने का ये मतलब नहीं की हमें बंदूक लेकर हमला करना हैं. हमें जरूरत है आंतरिक एकता की जहाँ हम कोई जाति कोई मजहब के न होकर भारतवासी हो. अपने आपसी मतभेदों को भुला हम एक हों जाएँ तो ऐसे आतंकवाद का मुक़ाबला कर पाने में समर्थ होंगे. अपने इतिहास से हमें सीख लेना होंगी और आतंक का मुँह तोड़ जवाब देना होंगा. जागो देशवासियों ये आक्रोश जताने का वक्त हैं.


“प्रेरणा शहीदों से हम अगर नहीं लेंगे
आजादी ढलती हुई साँझ बन जाएगी
यदि वीरों की पूजा हम नहीं करेंगे
सच मानो वीरता बाँझ बन जाएगी “

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

रविवार, 23 नवंबर 2008

कब तक ?


आज फिर कोई वैदेही को देखने आ रहा था. पूरे घर में साज सजावट और मेहमानों के स्वागत की तैयारियाँ हों रही थी. माँ वैदेही को हर बार की तरह शिक्षा दे रहीं थी __ देख बेटी ये रिश्ता बहुत अच्छे घर से आया हैं इस बार तू कोई नया ड्रामा या हंगामा खड़ा मत करना और वैदेही आशंका और डर से मन ही मन चिंतित हों रही थी. ये कोई नई बात नहीं थी इसके पहले भी वैदेही को कई लड़के देख चुके थे व सभी ने उसे पसंद भी किया था मगर हर बार वैदेही ने इनकार कर दिया. दरअसल वैदेही जब मात्र 8 साल की थी तब किसी अपने ही रिश्तेदार ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया था. यह बात वैदेही के अलावा कोई नहीं जानता था क्योंकि रिश्तेदार ने उसे डरा धमकाकर चुप कर दिया था व किसी से कुछ भी न कहने की हिदायत दी थी. जिसे वैदेही आज भी नहीं भुला पाई थी. उसे पुरुष जाति से नफरत हो गई थी यहीं कारण था कि वैदेही अब शादी नहीं करना चाहती थी.

बचपन की वो घटना याद आते ही वैदेही काँप जाती उसे अब किसी पर भरोसा नहीं रहा. पुरुष जाति केवल नारी को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और बाद में फेंक देते हैं बस यहीं विचार वैदेही के मन में घर कर गए थे. उसका आत्मविश्वास खो चुका था. कहीं भी जाने से डरती थी वैदेही. हर किसी को शक़ की निगाह से देखती थी. मगर हर बार शादी के लिए मना करना और माँ का दिल दुखाना अब वैदेही के लिए मुश्किल था. माँ बार बार वैदेही को समझा रही थी. विनती कर रही थी कि इस बार अपनी विधवा माँ का मान रख लेना और लड़के वालों के सामने अच्छी तरह पेश आना और हों सके तो माँ के लिए ही सही इस बार हाँ कह देना. वैदेही अनेक तरह की आशंकाओं से घिरी हुईं लड़के वालों के सामने खड़ी थी. हर बार की तरह इस बार भी लड़के वालों ने वैदेही को देखते ही पसंद कर लिया और हाँ कह दी. वैदेही ने भी माँ की चिंता को कम करने का सोच हाँ कह दिया. शादी की तैयारियाँ शुरु हुई और वो दिन आया जब वैदेही घर से विदा हुई. माँ वैदेही से लिपट कर खूब रोई लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे जो विदाई के दुख से अधिक गहरे थे. ससुराल में सभी ने वैदेही का बहुत अच्छे से स्वागत किया. धन की कोई कमी न थी आलीशान कोठरी और नौकर चाकर थे.

पर वैदेही को ये सब वैभव की चाह न थी वह तो आज तक जिस सोच जिस डर में जी रहीं थी उससे बाहर आना चाहती थी. पर वैदेही को यहाँ भी किस्मत ने दगा दिया उसके पति ने सिर्फ उसकी खूबसूरती देख उससे शादी की थी उसकी भावनाओं के लिए पति के दिल में कोई जगह न थी. वैदेही पहली ही रात अपने पति की जबरदस्ती का शिकार हुई और ये सिलसिला अब आम होता गया.पहले से ही आहत वैदेही मन हि मन घुटने लगी पर अपने दिल की व्यथा किससे कहें. सब कुछ चुपचाप सहन कर वैदेही मात्र एक शरीर बन गई जिसकी आत्मा बहुत पहले मर चुकी थी. वैदेही की व्यथा उसके दिल के एक कोने में बंद होकर रह गई जो कभी बाहर न निकल सकीं.

आज कितनी ही ऐसी वैदेही हैं समाज में जिन्हें किसी अपने ने छला हैं जो किसी अपने की ही हवस का शिकार बनी और जिंदगी भर के लिए मौन हों गई. ऐसी कई वैदेही जो पुरुष वर्ग से घृणा करती हैं जिन्हें अब किसी पर भरोसा नहीं. जिनकी जिंदगी पल भर में तबाह हों गई. आए दिन समाचार पत्रों में बलात्कार दुराचार की खबरें आती हैं. ज्यादातर को अपनों ने ही शिकार बनाया हैं. कही मज़बूरी में काम कर रही नौकरानी के साथ तो कभी मासूम बच्ची के साथ दुराचार किया जाता हैं.

मैं सवाल करती हूँ पुरुष वर्ग से क्या नारी का आत्मसम्मान, भावनाएँ, उसकी इच्छाए कोई मायने नहीं रखती? क्या नारी एक शरीर मात्र हैं? आधुनिकता का चोला पहने लोग भी नारी को वस्तु समझते हैं. कितनी ही नारियों को उनके पति ने ही शिकार बनाया कितनों को देवर, जेठ, या किसी रिश्तेदार ने. ? कहाँ खो गया हैं हमारा जमीर हमारे संस्कार? क्यों हमारी सोच इतनी गंदी हों गई हैं? हमारे देश में नारी को देवी माना गया वहीं दूसरी और इस तरह मात्र दिखावे की वस्तु समझ कर उपयोग किया गया. मात्र कुछ क्षण का आनंद पुरुष को इतना अंधा बना देता हैं कि उसका विवेक ही मर जाता हैं? आखिर क्यों? और कब तक.........????

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

बुधवार, 12 नवंबर 2008

मूक हैं इसलिए ?


जब भी आकाश में पंछी को देखती हूँ बहुत आनंद मिलता हैं उसकी उड़ान देख कर.खुले मैदान में गाय, बकरी बछड़े जब स्वतंत्रता से विचरते हैं तो खुशी होतीं हैं लगता हैं कि ये जीव हम इंसानो से तो बेहतर हैं प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं किसी को बिना वजह तकलीफ नहीं देते. और हम जानवरों के साथ अत्याचार करते हैं सिर्फ इसलिए की वो बोल नहीं पाते.हम लोग इंसान हैं और इंसान ने बहुत तरक्की की हैं. अपनी जाति बिरादरी को बचाने में हम तत्पर हैं लेकिन किसी मूक पशु पक्षी के बारे में क्या हमारी सोच इतनी विस्तृत हैं?

मुझे एक घटना याद आती हैं. भीषण गर्मी थी और दोपहर का समय था मैं घर पर थी. अचानक बाहर से आवाज आई- " नांदिया बाबा के लिए कुछ दे दो". मैने देखा बाहर एक युवक एक छोटे बछड़े को लेकर खड़ा हैं. गर्मी की वजह से मैंने दरवाजे से ही एक रूपए का सिक्का उसकी और उछाल दिया. पास के घर से पड़ोसन एक रोटी लेकर आई तो मैंने देखा ,बछड़ा रोटी की तरफ लपका लेकिन उस युवक ने रोटी लेकर तेजी से झोले में डाल ली. जिज्ञासावश में बछड़े के पास गई तो देखा उसकी आँख में एक फूला हुआ सा कुछ था जिसके कारण वह युवक उसे नंदिया बाबा बता रहा था.

अत्यंत मरियल बछड़े की एक एक हड्डी साफ नजर आ रही थी. वह दीन आँखों से मुझे देख रहा था जैसे कह रहा हो मुझे इस कसाई से बचा लो. वह युवक उसके गले की रस्सी खींचता हुआ ले जा रहा था. बछड़ा एक कदम भी चलने को तैयार नहीं था पर रस्सी के गले पर पड़ते दबाव के कारण घिसियाता हुआ पीछे पीछे चला जा रहा था. मै उस मूक निरीह और मासूम बछड़े को जाते देखती रहीं और कुछ नहीं कर पाई.

जो लोग इनके नाम से अपना पेट भरते हैं वे इन्हें भरपेट भोजन भी नहीं कराते, यह देख मन विषाद से भर गया. उस बछड़े की दयनीय आँखें आज भी मेरा पीछा करती हैं और मन में टीस उठती हैं. क्यों हम मूक पशु पक्षियों को नहीं समझ पाते? क्यों उनके साथ बुरा सलूक किया जाता हैं?
कम से कम ये ईमानदार तो हैं इनकी दुनिया में सच्चाई और वफादारी का स्थान हैं. जहाँ झूठ,फरेब,ईर्ष्या नहीं होता सिर्फ प्यार होता हैं. ऐसी दुनिया से तो हमे प्रेरणा लेना चाहिए. उनके साथ बुरा सलूक करने के बजाए उन्हें भी प्रेम दीजिए. जो मूक हैं मासूम हैं उन्हें किस बात की सजा? कम से कम प्रेम पाने का हक सभी को हैं चाहे वो जानवर हों या इंसान. केवल पढ़कर या टिप्पणी देकर अपने कर्तव्यों की इतीश्री नहीं समझे बल्कि इस पर चिंतन करें और हों सकें तो पालन भी. कभी मूक दर्शक न बने बल्कि अन्याय व अत्याचार को रोकने का प्रयास करें. जो मैं अब करने का प्रण ले चुकी हूँ.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

गुरुवार, 30 अक्तूबर 2008

सपनों का भारत



हर वर्ष दीपावली आती हैं और लाखों करोड़ों रुपए पटाखे बन धुएँ में बदल जाते हैं. हर वर्ष यहीं प्रश्न मन में उठता हैं कि क्या यहीं सही तरीका हैं त्योहार मनाने का..?
देश में जहाँ आर्थिक रूप से संपन्न लोग हैं वहीं एक वो तबका भी हैं जिसे दो वक्त की रोटी नसीब नही होतीं. कई बच्चे आज भी भूख से तड़पते हुए मौत की नींद सो जाते हैं.

कहीं बाढ़ तो कहीं सूखे की मार से परेशान चेहरे. कहीं भूकंप की चपेट में आए परिवार के अनाथ बच्चे. भूख से बिलखता मासूम और उसकी बेबस माँ. मज़बूर पिता जो गरीबी के कारण अपने बच्चों को नए कपड़े मिठाई नहीं दिला सकता. ऐसे हजारों चेहरे जिनके लिए दिवाली खुशियाँ नहीं लाती बल्कि उनके बच्चे ललचाई नजरों से उच्च वर्ग को दिवाली मनाते देखते हैं और आस लगाते हैं कि एक दिन उनकी किस्मत का तारा भी चमकेगा.

हर साल में ये सवाल अपने आप से करती हूँ. जब लोगो को हजारों रुपयों को जलाते हुए देखती हूँ. इस देश में एक वर्ग ऐसा हैं जो एक वक्त रोटी खाता है और दूसरे वक्त पानी से गुजारा करता है. वहीं दूसरी तरफ उच्च वर्ग कई तरह के मिष्ठान खाता हैं और बचा हुआ फेंक देता हैं.

मैं ये सोचती हूँ कि जितने रुपयों के हम पटाखे जलाते हैं वहीं रुपयों से यदि किसी जरूरत मंद की मदद की जाएँ तो सही मायने में त्योहार सार्थक होंगा. किसी गरीब की मदद कर के जो सुकून मिलेगा वो इन पटाखे से लाख गुना बेहतर हैं. मैं ये नहीं कहतीं की त्योहार नहीं मनाए, जरूर मनाए खुशियाँ तो बाँटने से बढ़ती हैं लेकिन उन्हीं खुशियों में कुछ ऐसे लोगों को भी शामिल करें जिनके लिए पेट भर भोजन सपने की तरह हैं. ऐसे चेहरों पर मुस्कान लाइए आपका त्योहार अनोखा होंगा ये मेरा दावा हैं.

मैं ये जानती हूँ कि केवल लिख देने या कह देने से कुछ बदलता नहीं बल्कि प्रयास करने से बदलाव आते हैं यह केवल अपनी वाहवाही पाने को लिखा गया लेख नहीं बल्कि मेरा प्रथम प्रयास हैं बदलाव की दिशा में.
मैं चाहती हूँ कि हम बदले हमारी सोच बदले हमारा तरीका बदलें ताकि देश में नई रोशनी नई किरण फैले और एक नई सुबह हो जिसमें हर जगह सुख शांति प्यार हों. जहाँ कोई भूख से दम न तोड़े.कोई लाचारी न हों. ऐसा भारत जहाँ केवल आत्मीयता और प्रेम हों भेदभाव न हों हिंसा न हों.

मुझे यकीन हैं कि आप लोग मेरा सपना साकार करने में मेरी मदद करेंगे और अब से हर वर्ष दिवाली नए तरीके से मनाएँगे और केवल दिवाली ही क्यों किसी को खुशियाँ देने के लिए हर दिन महत्वपूर्ण हैं बस हम फिजूल खर्च न कर किसी नेक कार्य में पूँजी लगाए. उम्मीद करती हूँ मेरा लिखा सार्थक होंगा.

“ न कहीं दंगा न कहीं फसाद होंगा
हिंदू, मुसलमान हर जगह साथ साथ होगा
सभी के बाग में मोहब्बत के फुल खिलते हों
हाँ मेरे सपनों का ऐसा भारत होगा”

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

पापा की सीख


बचपन से बेटी अपने पापा के बहुत नजदीक होती है. पापा के दिल का टुकड़ा. जरा सी खरोंच भी आ जाएँ तो पापा अपनी बिटिया की तकलीफ दूर करने को तत्पर रहते है.

मै भी वैसे ही अपने पापा के बहुत नजदीक हूँ. मेरे पापा मेरे आदर्श है. बचपन से ही मेरी दुनिया अपने पापा से शुरु होती है.मेरे हर हुनर को पापा ने पहचान दी. समय बीतता रहा और कब मेरी उम्र विवाह योग्य हो गई मैं नही जानती.लेकिन पापा के चेहरे पर कभी कभी वो चिंता की लकीरें दिखाई देती थी जो एक पिता को अपनी बेटी के विवाह के लिए होती है.

और एक दिन वो घड़ी भी आई जो एक बेटी और पिता के लिए सबसे मुश्किल घड़ी होती है. वो घड़ी थी मेरी विदाई की. मुझे माता पिता ने बचपन से अच्छे संस्कार देने का प्रयास किया था. पढ़ाई के कारण ज्यादातर समय मैं अपने घर से दूर रही हूँ इसलिए ग्रहकार्य कर पाने मे निपुण नही थी.

पापा इस बात को अच्छी तरह से जानते थे. पापा मेरे मार्गदर्शक और मेरे पथ प्रदर्शक भी रहे हैं. इसलिए मेरी समस्या को समझते हुए उन्होंने मेरे लिए एक पत्र लिखा और मेरी बिदाई के समय वह पत्र मेरे हाथ मे देकर नम आँखों से मुझे बोले मैंने तुम्हारे लिए कुछ लिखा है जो शायद तुम्हारे लिए उपयोगी साबित होंगा इसे बाद मे पढ़ लेना.


वह पत्र मेरे लिए किसी अमृत वचन से कम नहीं है. समय समय पर उस पत्र ने मेरा बहुत साथ दिया. मैं उस पत्र को आप सभी के साथ शेयर करना चाहती हूँ ताकि जैसे मुझे उस पत्र ने मार्गदर्शित किया कुछ और बेटियों को भी मार्गदर्शित कर सकें.

प्रिय मोना,

आज पहली बार तुम्हारे पापा को तुमसे कुछ कहने के लिए कलम का सहारा लेना पड़ रहा है. लेकिन मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि ये सब मैं तुम्हें उस क्षण बता सकूँ जब तुम अपने पापा को छोड़ नए दुनिया मे कदम रख रही होंगी.
बिटिया जब आपका विवाह होता हैं तो आप उस पूरे परिवार से जुड़ जाते हो. हमेशा अपने परिवार का मान सम्मान बनाए रखना. मैने और तुम्हारी मम्मी ने हमेशा तुम्हें अपने से बड़े का आदर करना सिखाया है इसे भूलना नही.
मै जानता हूँ कि तुम्हें घर के कार्य ठीक से नहीं आते लेकिन धैर्य व लगन से यदि कार्य करने का प्रयास करोंगी तो निश्चित रूप से सभी कार्य कर पाओंगी. तुम्हें कुछ जरूरी बातें बता रहा हूँ जो तुम्हें मदद करेंगी.

प्रातः जल्दी उठने की आदत डाले. इससे कार्य करने मे आसानी होती है साथ ही शरीर भी स्वस्थ रहता है.

घर के सभी बड़े लोगो को सम्मान दे व कोई भी कार्य करने से पूर्व उनकी अनुमति ले.

भोजन मन लगाकर बनाने से उसमें स्वाद आता है कभी भी बेमन या घबराकर भोजन नही बनाओ बल्कि धैर्य से काम लो.

यदि तुम्हें कोई कार्य नही आता तो अपने से बड़े से उसके बारे मे जानकारी लो.और उसे करने की कोशिश करो.

गुस्सा आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है. हमेशा ठंडे दिमाग से काम लो. जल्दबाजी मे कोई कार्य न करो.

गलतियाँ सभी से होतीं है. कभी भी कोई गलती होने पर तुरंत उसे स्वीकार करो. क्षमा माँगने से कभी परहेज़ न करो.

किसी के भी बारे मे कोई भी राय बनाने के पहले स्वयं उसे जाने,परखे तभी कोई राय कायम करे.सुनी हुई बातों पर भरोसा करने के बजाए स्वविवेक से निर्णय ले.

सास ससुर की सेवा करें. उन्हें दिल से सम्मान दे. उनकी बातों को नजर अंदाज न करे. न ही उनकी किसी बात को दिल से लगाए.

हमेशा अपने पापा के घर से उस घर की तुलना न करो. न ही बखान करो. वहाँ के नियम वहाँ के रिवाज अपनाने का प्रयास करो.

किसी भी दोस्त या रिश्तेदार को घर बुलाने के पहले घर के बड़े या पति की आज्ञा ले.

विनम्रता धारण करो. संयम से काम लो.कोई भी बिगड़ी बात बनाने का प्रयास करो बिगाड़ने का नही.

कोई भी कार्य समय पर पूरा करे. समय का महत्व पहचानो.हर कार्य के लिए निश्चित समय निर्धारित करो व उसे पूर्ण करो.

घर के सभी कार्य मे हर सदस्य की मदद करें. जो कार्य न आए उन्हें सीखे.


ऐसी और भी कई छोटी छोटी बातें है जिनका यदी ध्यान रखा जाएँ तो गृहस्थी अच्छी तरह से चलती है. बिटिया अपनी जिम्मेदारियो से मुँह नही फेरना बल्कि उन्हें अच्छी तरह से निभाना. मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. मै जानता हूँ कि तुम अपने ससुराल मे भी अपने मम्मी पापा का नाम ऊँचा रखोंगी व हमे कभी तुम्हारी शिकायत नही आएँगी. तुम सदा खुश रहो और अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से निभाओ यही आशीर्वाद देता हूँ.

तुम्हारा पापा
राजेंद्र दुबे


दोस्तों , आज मै अपने ससुराल मे सबकी चहेती हूँ. ससुर जी मेरी तारीफ करते नही थकते. ये सब पापा की सीख का परिणाम है. उम्मीद करती हूँ कि आपको भी मेरे पापा की सीख मदद करेंगी. और आप भी अपने गृहस्थ जीवन मे सबके चहेते बने रहेंगे.

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)