गुरुवार, 17 जून 2010

वास्तविक दान


हाल ही मे जब मे अपने मायके से कोलकाता वापिस आ रही थी तब ट्रेन मे मेरे साथ एक सभ्रान्त परिवार की बुजुर्ग महिला भी सफ़र कर रही थी. अपने पूरे सफ़र के दौरान मेने देखा की वो जब भी कोई नदी या तालाब आता तो सिक्के निकाल कर उसमे डालती थी और एक बार तो उन्होने पूरा १०० रु. का नोट बाहर डाल दिया जब मेने उन्हे हेरानी से देखा तो खिसियानी हँसी हँसते हुए बोली की पर्स मे हाथ डालने पर सबसे पहले १०० का नोट आया सो यही डाल दिया जो जल माता के भाग्य मे हो वही सही.

मे सोच रही थी की अगर उनके हाथ मे ५०० या १००० का नोट आता तो क्या वो भी वो पानी मे डाल देती दान और पुण्य कमाने के नाम पर. और ये जानते हुए भी की पानी मे जाने पर ये किसी के काम नही आ पाएँगे. इसी तरह वो पूरे रास्ते भिखारियो को भी कुछ न कुछ देती रही.

बात केवल उन महिला की नही हे मेने कई इस तरह के लोगो को देखा हे जो नदियो मे मंदिरो मे खूब सारा दान करते हे और समझते हे की एसा करने से उनके सारे पाप धुल जाएँगे. दान करना मे ग़लत नही मानती लेकिन दान सिर्फ़ दिखावे के लिए और फ़िजूल किया जाए ये बात अखरती हे.

आप ये क्यो नही सोचते की इन्ही रुपयो से किसी ग़रीब बच्चे की स्कूल की फिस दी जा सकती हे. या उसे कुछ खिलाया जा सकता हे. किसी ज़रूरतमंद की मदद से बड़ा कोई पुण्य नही हो सकता. कई लोग धार्मिक स्थानो पर लाखो रुपयो का दान करते हे और अपने ही घर काम करने वाली बाई के बच्चो को ज़रा सा कुछ देने मे भी कतराने लगते हे. भगवान के लिए सोने और चाँदी के मुकुट या सिंहासन बनवाए जाते हे और झोपड़ पट्टी के लोगो को देख नाक भौ सिकोड लेते हे. ये केसा दान हे. इसमे किसका भला होगा ये बात मुझे समझ नही आती.

दिखावे मे दिया गया दान दान नही होता दान छुपा कर दिया जाए तो उसका महत्व हे. आजकल धर्म के नाम पर दान आम बात हे. मे इसका विरोध नही करती पर मुझे तरीका ठीक नही लगता. कही ये लाइन पढ़ी थी वही जेहन मे आ रही हे

"तेरा बाजार तो महँगा बहुत हे
लहू फिर क्यो यहा सस्ता बहुत हे
कलम को छोड़ माला हाथ मे ले ले
धर्म के नाम पर धंधा बहुत हे "

कहने का तात्पर्य सिर्फ़ यही की धर्म के नाम पर आप क्या कर रहे हे एक बार सोचे उसके बाद कदम उठाए.

मे तो इतना समझती हू की "घर से मस्जिद हे बहुत दूर चलो यू कर ले किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए" दिखावा कर के मंदिर मे दान करने की बजाए किसी बच्चे को शिक्षा दिलवाए उसके कपड़े बनवाए उसके खाने का प्रबन्ध करे तो शायद सही अर्थो मे भगवान की अर्चना होगी और वो प्रसन्न होंगे. और हमारा इंसानियत का धर्म हम सच्चे अर्थो मे निभा पाएँगे. जो धर्म बाकी सभी धर्मो से उपर हे. बस यही निवेदन हे आप सभी से की एक बार मेरी बात पर विचार ज़रूर कीजिएगा.

प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)





रविवार, 6 जून 2010

नई सीख










शुक्रिया मेरी नई जिंदगी मेरे जीवन मे नए रंग भरने का शुक्रिया. तुम्हारी मासूम किल्कारिया नटखट हँसी चंचल आँखे देख कर मुझे महसूस होता हे की मे अभी तक कितने बड़े सुख से वंचित थी. तुमने आकर वो कमी पूरी की. मेरे अधूरेपन को पूरा किया. और मुझे हर दिन नई सीख भी देते हो.

आज महसूस होता हे की मम्मी पापा ने भी इसी तरह रात रात भर जाग कर अपनी परवाह किए बिना किस तरह से हमे बड़ा किया होगा और हम कितनी आसानी से उनका दिल दुखा देते हे. आज महसूस होता हे की जब मम्मी प्यार से खाना बनाकर खिलाती थी और हम स्कूल या कॉलेज जाने की जल्दी मे बिना खाए ही चल देते थे. छोटी छोटी बात मे उनसे रूठ जाते थे. पापा से अपनी फरमाइश पूरी करने के लिए अड़ जाते थे. और केसे मम्मी पापा भी हमारी हर खुशी हर फरमाइश को पूरा करने की कोशिश करते थे. हमारी खुशी देख कर उनके चेहरे का सुकून आज भी आँखो मे घूमता हे. आज भी मम्मी पापा अपनी बिटिया की खुशी के लिए बेटे की खुशी के लिए हर संभव प्रयास करते हे.

मेरे बेटे तुमने मेरी जिंदगी मे आकर मुझे अहसास दिलाया की औलाद को बड़ा करना कितना मुश्किल हे और जब वही औलाद माता पिता के व्रद्धावस्था मे उन्हे सहारा न दे तो उन्हे कितनी तकलीफ़ होती होगी. मेरे बेटे तुमने मुझे मेरे गुस्से पर काबू रखना धीरज रखना सिखाया. कितनी बार मम्मी से मे गुस्सा होती थी और वो मुझे मनाती रहती थी. कितनी बार मम्मी खाना की प्लेट लगाती और छोटा भाई कुछ फरमाइश करता तो अपना खाना बीच मे छोड़ कर मम्मी उसकी ज़िद पूरी करती. कभी हम बीमार होते तो पूरी रात मम्मी पापा सो नही पाते.

मुझे याद हे अपने बचपन मे एक बार मेने पापा से साइकिल लाने की ज़िद की थी और पूरा दिन कुछ नही खाया था पापा मेरे लिए १५० किलोमीटर दूर से बाइक पर पीछे सवार होकर और हाथ मे छोटी साइकिल लिए घर आए थे पापा के हाथ सूज गये थे इतनी दूर साइकिल उठाने से. लेकिन मे उनकी हाथो की सूजन नही देख पाई बल्कि अपनी साइकिल देख खुशी से झूम उठी और पापा भी अपना दर्द भूल खुशी से मुस्कुराने लगे.

मुझे पहली बार होस्टल के लिए भेजते समय मम्मी पापा की आँखे कितना कुछ कह रही थी. कितनी हिदायते और साथ मे नम आँखे लिए दोनो मुझे स्टेशन छोड़ने आए थे. और हॉस्टल से जब भी घर जाती मम्मी तरह तरह के पकवान बना बना कर खिलाती सारी मेरी पसंद का खाना पूरा दिन मम्मी किचन मे लगी रहती और पापा बाजार से मेरी ज़रूरत की सारी चीज़े लेकर आते. मेरी पहली जॉब की पहली सेलेरी से जब मम्मी के लिए साडी और पापा को शॉल दिया था तो दोनो रोने लगे थे.

शादी के समय भी पापा ने मुझे बहुत प्यारा सा तोहफा एक खत के रूप मे दिया था ( आप उसे मेरे पुराने पोस्ट मे "पापा की सीख" के रूप मे देख सकते हे.http://bhattmonika.blogspot.com/2008/10/blog-post_25.html) जो मेरे लिए बहुत अनमोल हें.

ये सारी बाते आज अपने बेटे को देख आँखो मे घूमती हे. और मे मन ही मन ये सोचती हू की अब कभी मम्मी पापा का दिल किसी बात से नही दुखे ये कोशिश करूँगी. और आप से भी यही अनुरोध करूँगी की मम्मी पापा का दिल नही दुखाना कभी भी.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

बुधवार, 24 जून 2009

काली का कल्लू



काली ऐ काली चिल्लाते बच्चे पीछे दौड रहे थे और काली इतराती, बलखाती, उछलती कभी दोनों पैर से खडे होकर बच्चो को डराती इधर से उधर दौङ रही थी. हा कलकत्ता की एक तंग बस्ती मे रहने वाले उस्मान भाई की बकरी का नाम काली ही था . दस दिन पहले ही उस्मान भाई बाजार से इसे खरीद कर लाये थे. बकरी का रंग , बाल, आँखे और सींग इतने खूबसूरत थे कि बरबस ही लोग उसे देखने लगते और दुलारने लगते.

धीरे धीरे काली पूरी बस्ती की चहेती बकरी बन गई. हर कोई उसे काली कह कर आवाज़ देता और वह दौड़ी चली आती. काली रोज अज़ान के समय मस्जिद के पास पहुँच जाती सारी बस्ती के लोग उसे नमाज़ी समझते और कुछ खाने को देते रहते. खाने के लालच मे ये काली सारा समय मस्जिद के आस पास ही बिताती थी.

एक साल बाद काली ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया बस्ती के बच्चो ने उसका नाम कल्लू रख दिया. अब बच्चे कल्लू के साथ शरारत करते और दिन भर काली का कल्लू, काली का कल्लू का शोर करते रहते. बच्चा बड़ा हुआ और वह भी समझ गया की मेरा नाम कल्लू और मेरी माँ का नाम काली है. अतः इस संबोधन पर दोनो किसी के भी बुलाने पर दौड़े आते थे. कल्लू भी माँ के साथ मस्जिद जाता और मस्जिद आने जाने वाले हर नमाज़ी से टकराता लोग समझते की वह सलाम कर रहा है. कल्लू खा खा कर खूब तगड़ा हो रहा था और उस्मान भाई काली का दूध पी पी कर उसे ललचाई नज़र से देखते रहते की बकरी ईद पर यह अच्छे पैसे देकर जाएगा.

शाम के समय काली मस्जिद से लौट रही थी. कल्लू मोहल्ले के बच्चो के साथ कही और था. एक ट्र्क अनायास मस्जिद के बाजू से घुसा और काली को रौंदता हुआ चला गया. सामने याक़ूब चाचा जोर से चिल्लाए अरे रोको साले ने काली को मार दिया. आवाज़ सुन सामने खड़े दो चार लोगो ने ट्र्क रोका, न जाने किसने उस्मान भाई को भी खबर कर दी. वह भी दौड़ कर आ गया काली से लिपट कर रोने लगा और ट्र्क ड्राइवर का कॉलर पकड़ कर मार पीट करने लगा. साथ के लोगो ने बीच बचाव किया तथा ट्र्क वालो से 2000/- रु. नगद उस्मान भाई को दिलवाए. रुपए लूँगी मे खोंस उस्मान भाई ने काली को गौर से देखा कुछ साँसे बाकी थी. उसने तुरंत काली को उठाया और कसाई के पास ले गया और 800/- रु. मे काली का सौदा कर दिया. काली की मौत के 2800/- रु. पाकर उस्मान बहुत खुश था उसने बाजार से जलेबी ली और घर की और चल पड़ा.

इधर कल्लू अपनी माँ को न पाकर बेचेन हो गया. किसी के बुलाने पर आता नही कोई कुछ खिलाना चाहे तो ख़ाता नही. बच्चे परेशान हो गए की कल्लू को क्या हो गया. कल्लू कभी मस्जिद, कभी नीम के पेड़ के नीचे कभी उस्मान भाई का आँगन जॅहा काली बैठी होती थी वहा माँ को ढूँढ रहा था. लेकिन उसे माँ नही मिली. उस्मान भाई ने आते ही कुछ जलेबी निकाल कर कल्लू की तरफ़ बड़ाई लेकिन कल्लू ने मुँह घुमा लिया. उस्मान भाई को समझ मे नही आया फिर बोले- साले को मस्जिद मे आज ज़्यादा खाने को मिल गया होगा इसलिए पेट भरा बकरा इतरा रहा है. शाम को उस्मान ने काली के रहने की जगह से टाट पट्टी, रस्सी हटा दी तो कल्लू और बेचेन हो गया की माँ कहा गई. वह आँख मे आँसू लिया भूखा में-में करता बीमार सा पड़ गया. उसे देख उस्मान भाई को ज़्यादा चिंता थी की इसे कुछ हो गया तो बकरी ईद पर जो रुपए मिलने की उम्मीद है उसका क्या होगा.


कल्लू मस्जिद के पास नीम के पेड़ के नीचे बेहाल पडा था तभी कुछ लोग हाथ मे झंडे लिए जय काली- जय काली के नारे लगाते हुए पास से गुजरे. कल्लू ने काली का नाम सुना तो दौड़ पडा और भीड़ मे शामिल हो चलने लगा. काली के भक्तो ने अपनी जमात मे जब एक बकरे को देखा तो सभी आश्चर्य चकित रह गये उन्होने कल्लू को आगे कर जय काली का जय घोष किया और नाचने लगे और कल्लू को लगा की ये लोग मुझे मेरी माँ के पास ले कर जाएँगे तो वह भी खुशी से नाचने लगा. लोगो ने कल्लू के गले मे हार और सर पर गुलाल लगाया और साथ लेकर मंदिर की ओर चल पड़े. कल्लू भी उनके साथ खुशी-खुशी चल रहा था.

इधर उस्मान भाई का परिवार कल्लू को ढूँढ ढूँढ कर परेशान हो रहा था. उस्मान भाई ने बकरी ईद पर कल्लू को बेचकर जोरुपए मिलने के सपने संजोए थे वो बिखरते नज़र आने लगे. उस्मान भाई की पत्नी कल्लू को कोस रही थी नास -पिटा, हराम खोर न जाने कहा गया हमारा त्योहार बिगाड़ गया. काली तो जाते जाते कुछ दे गई थी पर ये मुआ ऐसे ही चला गया.



उधर माँ काली के मंदिर मे हार गुलाल से लदा हुआ काली भक्तो के बीच कल्लू अपनी माँ से मिलने को आतुर था. बार बार में-में चिल्लाकर दो पेरो पर खड़े हो कर खुशी मना रहा था. कालिका मंदिर मे इस अद्भुत द्र्श्य को देखने के लिए हज़ारो की भीड़ खड़ी थी. अनायास ज़ोर-ज़ोर से नगाड़े ,घंटी, घड़ियाल गूंजने लगे जय माँ काली, काली माँ की जय के उद्घोष से आसमान गूँज उठा. और कल्लू जब जब काली का नाम सुनता खुशी से झूमने लगता उसे लगता की अब वह माँ के ज़्यादा करीब है. उसकी आँखो की चमक से, चेहरे की खुशी से अपनी माँ से मिलने की ललक साफ दिखाई दे रही थी.

लोग माँ काली की पूजा कर कल्लू को वध स्थल की ओर ले गये जहा कल्लू के माथे पर तिलक लगा कर पूजा की गई. माँ काली के भक्त झूमने लगे, माँ काली की जय कह कर कल्लू को बलि स्थान की और इशारा किया, कल्लू को लगा की शायद यही माँ होंगी इस विश्वास से कल्लू ने अपना गला वध स्थल से टिका दिया. सारा वातावरण काली माँ की जय, सर्व पाप- हरिणी, कष्ट निवारिणी, सभी जीव पर दया करने वाली माँ तेरी जय हो. हे माँ हमारी बलि क़बूल करो की आवाज़ के साथ कल्लू का सिर धड़ से अलग हो गया.

कल्लू का कटा सिर माँ कालिका के चरणो मे था और कल्लू की आँख एसे लग रही थी मानो अब भी अपनी माँ को खोज रहीथी. काली के भक्त इस बलि से खुश थे, की माँ काली हम पर खुश है. पता नही भक्तो को माँ काली का आशीर्वाद मिला या नही कल्लू को उसकी माँ मिली या नही. कल्लू की बलि काली मंदिर मे होना थी या उसकी कुर्बानी बकरी ईद पर होना थी इसका फेसला आप करना. पर मुझे ज़रूर बताना की मे माँ काली को प्रसन्न करने के लिए क्या करू.................????????


प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

प्यार


प्यार का इजहार करने के लिये क्या कोई दिन निश्चित होता हैं यह तो कभी भी किया जा सकता हैं हाँ एक बहाना जरूर मिल जाता हैं रिश्तों को फिर से नवीन करने के लिए. प्यार शब्द में सारी दुनिया समाई हुई हैं.एक मीठा एहसास जो जीवन में ताजगी भर देता हैं. प्यार आदमी को बहुत कुछ सिखाता हैं. कभी कभी खामोशी भी शब्दों से अधिक असरदार होतीं हैं. रिश्तों में यदि प्रेम न हो तो वे अधूरे रह जाते हैं और कुछ प्रेम ऐसा भी होता हैं जिसका कोई रिश्ता नहीं होता.

बहुत कुछ हैं लिखने के लिए लेकिन फिर भी हम प्रेम का सही मायनों में अर्थ नहीं जानते. दुख होता हैं जब समाचार पत्रों में खबर पढ़ती हूँ कि प्रेमी ने प्रेमिका की जान ली.प्रेमिका ने आत्मा हत्या की और ऐसी ही कई खबरें जहाँ प्रेम के नाम पर कुछ और किया जाता हैं. प्यार तो व्यक्ति को सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर ले जाता हैं लेकिन कुछ लोग प्यार के मायने ही बदल देते हैं.

प्यार में पाने में आनंद नहीं बल्कि खोने में हैं. किसी की आँख का आँसू आपकी आँखों में हो और किसी का दुख आपकी नींद उड़ा दे, किसी की हँसी आपके लिये सबसे कीमती हो और आप सारी दुनिया को भुला दे. यही तो प्यार के रंग हैं. आज लोगों में ईर्ष्या ,द्वेष नफरत इतने घर कर गए हैं कि प्यार को जगह ही नहीं मिल पाती. प्यार मात्र शारीरिक आकर्षण और तोहफे लेन देन का नाम नहीं.बल्कि आपकी भावना हैं जो आपके दिल में हैं. कुल मिलाकर जितना कहूँ कम ही होंगा.

सिर्फ यहीं कहना चाहती हूँ कि एक दिन महँगे तोहफे देने, और आई लव यूँ कहने को प्यार नहीं कहते. बल्कि प्यार खुद ही अनमोल तोहफा हैं जिसे किसी और तोहफे की जरूरत नहीं. न शब्दों की जरूरत हैं. सिर्फ एहसास हैं ये रूह से महसूस करों प्यार को प्यार ही रहने दो कोई......................


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

सोमवार, 19 जनवरी 2009

मेरी दादी


जब मैं छोटी थी तब तुम मुझे खोज लिया करती थी छुप जाने पर और अपनी गोद में बिठाकर ढेर सारे किस्से कहानियाँ सुनाती थी. बाबूजी जब गुस्सा होते तो तुम झट बच्चों की तरफदारी करती चाहें बाबूजी लाख नाराज हों.

पास पड़ोस की तुम अकेली ही वैद्य थी तुम्हारे पास हर बीमारी के लिए एक राम बाण औषधि होती थी. गाँव में किसी के घर बच्चे का जन्म होने वाला हों तो तुम ही थी जो क्या करना चाहिए क्या नहीं वो बताती थी. किसी के यहाँ विवाह तुम्हारे बिना संभव न था क्योकि सारे रस्मो रिवाज तो तुम्हें ही पता थे. चाहें वो मंडप, माता पूजन हों या बन्ना बन्नी गाना हों तुम सबसे अनमोल थी. घर में यदि कथा हों रही हैं तो पंडित जी को बार बार हिदायत देती थी तुम और पंडित की मजाल जो तुम्हारी बात से टल जाए.

मुझे भी तो कई बार प्यार भरी झिड़की देती थी जब मुझे खाना बनाना नहीं आता था. और माँ पिताजी को फटकार भी पड़ती थी मुझे घर के काम न सिखाने के लिए. एक बार तो तुमने मुझसे हाथ पकड़ कर मक्के की रोटी बनवाई थी. और रोटी जल जाने पर भी तुमने बड़े प्यार से केवल वही रोटी खाईं थी और कहा था की तेरे हाथ की रोटी सबसे अच्छी बनी हैं.
जब स्कूल में मुझे बड़ी क्लास की लड़की ने झगड़ा होने पर मेरी पिटाई की थी तब तुम ही थी जो मेरे लिए उस लड़की को घर जाकर फटकार आई थी. और तो और एक बार टीचर ने होमवर्क न करने पर जब मुझे सजा दी थी और मेरे हाथ सूज कर लाल हों गए थे तो तुमने उस टीचर की वो खबर ली थी कि पूरे स्कूल को हिला दिया था. जब मेरी जॉब लगी थी तब तुम इतनी खुश हुई की पूरे गाँव को पता चल गया था की मै समाचार पत्र में काम कर रहीं हूँ. साथ ही तुम्हें मेरे विवाह की भी चिंता थी जो तुम समय समय पर माँ पिताजी के सामने जाहिर करती थी. जब शादी की तारीख पक्की हुई थी तो तुम खुशी से नाच उठी थी और जमकर तैयारियों में जुट गई थी. जब ढोल बजता था तो तुम खुशी से नाचती थी और मेरी नजर उतारती थी. बिदाई के समय खूब रोई थी और फिर मुझे गाड़ी तक छोड़ने आई और मुझे समझाइश भी दी थी की बिटिया अपने घर का मान रखना और ससुराल में सबको खुश रखना .

तुम मेरे लिए सब कुछ थी माँ पिताजी से मुझे कुछ मनवाने के लिए मैं सदा तुम्हारा सहारा लेती थी. और पिताजी तुम्हारी बात कैसे टालते तुम उनकी माँ जो थी. मेरी दादी थी तुम. और मैं तुम्हारी लाड़ली पोती.

अचानक तुम कहाँ खो गई दादी..? तुम्हें कितना खोजा पर इस बार तुम नहीं मिल रहीं हों. बचपन में तो मैं तुम्हें झट खोज लेती थी और तुम्हारे गले लग जाती थी. पर आज तुम नहीं मिल रहीं हो दादी...? जब पिताजी ने बताया कि तुम हम सबको छोड़ कर चली गई हो तो मुझे लगा जैसे मेरा बचपन चला गया . जो अब तक तुम्हारे होने पर चंचलता थी वो तुम्हारे साथ चली गई. मेरे साथ साथ माँ पिताजी भी बहुत अकेले हों गए हैं दादी.
जब दादाजी हमें छोड़ कर गए थे मैं तुमसे लिपटकर रोई थी पर मुझे तुम्हारा हौसला था अब मैं बहुत अकेली हूँ दादी...... गाँव वाले भी तुम्हें बहुत याद करते है दादी..... तुम क्यों चली गई....? …. दादी मुझे तुम्हारी बहुत याद आती हैं......

प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

कलम...?


असंतुष्ट हूँ, चिंतित हूँ, परेशान हूँ, कश्मकश में हूँ. बहुत दिनों से लिखने का प्रयास कर रही हूँ मगर जब भी कलम हाथ में लेती हूँ विचार आता है कि क्या मेरी कलम अपना उद्देश्य निभा रही हैं? क्या मेरी आवाज वहा पहुँच रही है जहाँ में पहुँचाना चाहती हूँ.
बम ब्लास्ट हों रहे हैं.देश में उथला पुथल मचा हैं. कई लोगों ने लिखा चर्चा की और भूल गए........ मै नहीं भूल पा रहीं हूँ. मै शायद दिल से सोचती हूँ और दिल से ही लिखती भी हूँ तभी मुझे शायद एक अच्छे पत्रकार की तरह लिखना नही आता तभी मुझे चंद प्रतिक्रियाओं और लेखन से शान्ति नहीं मिलती.........??

कितने ब्लॉग हैं और कितने सारे लोग रोज लिखते हैं और बस लिखते ही रहते हैं. देश पर राजनीति पर अर्थव्यवस्था पर और न जाने कितने विषयों पर रोज लिखा जाता हैं लेकिन इन सबका कितना असर हों पाता हैं? कितने लोग है जो न केवल पढ़ते हैं,अमल भी करते हैं? समझ नही पा रहीं हूँ कि मैं कलम से क्या चाहतीं हूँ मुझे मेरे लेखन का उद्देश्य नहीं मिल रहा कही खो गया हैं बहुत खोजा मिला नहीं क्या कोई मुझे बताएगा की आज के समय में कलम का उद्देश्य क्या होगा? या क्या होना चाहिए?

बस आज इतना ही आपको मेरे सवालों का जवाब मिलें तो मुझे बताइए.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

जागो देशवासियों


मुंबई पर हुए आतंकी हमले पर बहुत लिखा जा चुका बहुत सुन लिया और बहुत कह भी लिया मगर जिनकी जान गई जो शहीद हुए उनके लिए कितनों ने बात की हैं..? मीडिया हर पल का सीधा प्रसारण दिखा कर अपने चैनल को तेज सबसे तेज घोषित करने की होड़ में लगा हुआ हैं. राजनीतिक दल हमारे तथाकथित नेता इस समय भी राजनीति करने से नहीं चूकते हैं. एक दूसरे की गलती निकालने एक दूसरे की टाँग खींचने में कोई पीछे नहीं हटना चाहता. सवाल ये हैं कि देश के बारे में कौन सोचेगा..?

हमले में जो शहीद हुए उन्हें शत शत नमन और उन परिवारों को सांत्वना जिन्होंने अपनों को खोया. शायद अब वक्त आ गया हैं जब हमें भारत माँ का ऋण चुकाने को आगे आना होगा. केवल बहस और भाषण से कुछ नहीं होगा समय है उचित रणनीति बनाने का सही कदम उठाने का , कुछ ऐसे ठोस कदम जो आने वाले समय में हमें इतना कमजोर साबित न कर पाए. हमें एकजुट होना होगा और इस आतंक से डटकर मुक़ाबला करना होगा.आपसी झगड़े भूल एकता दिखाने का मिलकर आतंक का सामना करने का वक्त है.

भारत इतना कमजोर कैसे हों सकता हैं कि चंद आतंकवादी पूरे देश को हिला दे ? क्या हमारे देश में इतना सामर्थ्य नहीं की इसका सामना कर पाए ? क्या वीरों की धरती पर वीरों का अकाल हों गया हैं ? हमारी संवेदनाएँ हमारी भावनाएँ कहाँ हैं ?

मीडिया जिसे अपना सही फर्ज निभाना था वो हर खबर को दिखाता रहा और दहशत बढ़ाता रहा. बजाए इसके कि कार्यवाही होने देते व प्रमुख खबरें आम जनता तक पहुँचाई जाती. नेता राजनीति न कर आगे की कार्यवाही पर प्रकाश डालते. कोई भी अपना कार्य ठीक से न कर पाया ?

और हम ? हमने क्या किया ? सुबह की चाय के साथ समाचार पत्र में और न्यूज चैनल में आतंकवादी हमले की खबर की निंदा की ? देश को कोसा ? सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह उठाए ? थोड़ी देर शहीद हुए लोगों के लिए खेद व्यक्त किया और लग गए अपने काम में ? क्या हमें हक हैं देश के नेता को या अन्य को कोसने का ?

मैं नहीं कहतीं की हमारे नेता या सुरक्षा व्यवस्था में कमी नहीं हैं मैं मानती हूँ कमी हैं मगर जरूरत आज खुद कुछ करने की हैं . मेरे कहने का ये मतलब नहीं की हमें बंदूक लेकर हमला करना हैं. हमें जरूरत है आंतरिक एकता की जहाँ हम कोई जाति कोई मजहब के न होकर भारतवासी हो. अपने आपसी मतभेदों को भुला हम एक हों जाएँ तो ऐसे आतंकवाद का मुक़ाबला कर पाने में समर्थ होंगे. अपने इतिहास से हमें सीख लेना होंगी और आतंक का मुँह तोड़ जवाब देना होंगा. जागो देशवासियों ये आक्रोश जताने का वक्त हैं.


“प्रेरणा शहीदों से हम अगर नहीं लेंगे
आजादी ढलती हुई साँझ बन जाएगी
यदि वीरों की पूजा हम नहीं करेंगे
सच मानो वीरता बाँझ बन जाएगी “

प्रेषक
मोनिका दुबे (भट्ट)