बुधवार, 12 नवंबर 2008

मूक हैं इसलिए ?


जब भी आकाश में पंछी को देखती हूँ बहुत आनंद मिलता हैं उसकी उड़ान देख कर.खुले मैदान में गाय, बकरी बछड़े जब स्वतंत्रता से विचरते हैं तो खुशी होतीं हैं लगता हैं कि ये जीव हम इंसानो से तो बेहतर हैं प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं किसी को बिना वजह तकलीफ नहीं देते. और हम जानवरों के साथ अत्याचार करते हैं सिर्फ इसलिए की वो बोल नहीं पाते.हम लोग इंसान हैं और इंसान ने बहुत तरक्की की हैं. अपनी जाति बिरादरी को बचाने में हम तत्पर हैं लेकिन किसी मूक पशु पक्षी के बारे में क्या हमारी सोच इतनी विस्तृत हैं?

मुझे एक घटना याद आती हैं. भीषण गर्मी थी और दोपहर का समय था मैं घर पर थी. अचानक बाहर से आवाज आई- " नांदिया बाबा के लिए कुछ दे दो". मैने देखा बाहर एक युवक एक छोटे बछड़े को लेकर खड़ा हैं. गर्मी की वजह से मैंने दरवाजे से ही एक रूपए का सिक्का उसकी और उछाल दिया. पास के घर से पड़ोसन एक रोटी लेकर आई तो मैंने देखा ,बछड़ा रोटी की तरफ लपका लेकिन उस युवक ने रोटी लेकर तेजी से झोले में डाल ली. जिज्ञासावश में बछड़े के पास गई तो देखा उसकी आँख में एक फूला हुआ सा कुछ था जिसके कारण वह युवक उसे नंदिया बाबा बता रहा था.

अत्यंत मरियल बछड़े की एक एक हड्डी साफ नजर आ रही थी. वह दीन आँखों से मुझे देख रहा था जैसे कह रहा हो मुझे इस कसाई से बचा लो. वह युवक उसके गले की रस्सी खींचता हुआ ले जा रहा था. बछड़ा एक कदम भी चलने को तैयार नहीं था पर रस्सी के गले पर पड़ते दबाव के कारण घिसियाता हुआ पीछे पीछे चला जा रहा था. मै उस मूक निरीह और मासूम बछड़े को जाते देखती रहीं और कुछ नहीं कर पाई.

जो लोग इनके नाम से अपना पेट भरते हैं वे इन्हें भरपेट भोजन भी नहीं कराते, यह देख मन विषाद से भर गया. उस बछड़े की दयनीय आँखें आज भी मेरा पीछा करती हैं और मन में टीस उठती हैं. क्यों हम मूक पशु पक्षियों को नहीं समझ पाते? क्यों उनके साथ बुरा सलूक किया जाता हैं?
कम से कम ये ईमानदार तो हैं इनकी दुनिया में सच्चाई और वफादारी का स्थान हैं. जहाँ झूठ,फरेब,ईर्ष्या नहीं होता सिर्फ प्यार होता हैं. ऐसी दुनिया से तो हमे प्रेरणा लेना चाहिए. उनके साथ बुरा सलूक करने के बजाए उन्हें भी प्रेम दीजिए. जो मूक हैं मासूम हैं उन्हें किस बात की सजा? कम से कम प्रेम पाने का हक सभी को हैं चाहे वो जानवर हों या इंसान. केवल पढ़कर या टिप्पणी देकर अपने कर्तव्यों की इतीश्री नहीं समझे बल्कि इस पर चिंतन करें और हों सकें तो पालन भी. कभी मूक दर्शक न बने बल्कि अन्याय व अत्याचार को रोकने का प्रयास करें. जो मैं अब करने का प्रण ले चुकी हूँ.


प्रेषक
मोनिका भट्ट (दुबे)

9 टिप्‍पणियां:

Vinay ने कहा…

सही बात पर लेख प्रस्तुतिकरण हेतु बधाईयाँ लें!

बेनामी ने कहा…

sahi baat kahi,bahut marmik lekh

रंजना ने कहा…

आपका साधुवाद,इस मुद्दे को उठाने के लिए. अक्षरशः सत्य कहा आपने.....
बस इतना लगता है की आप जैसा ह्रदय ही सबका हो जाए तो फ़िर ईश्वर की इस श्रृष्टि में निरीह पशु पक्षी मनुष्यों द्वारा प्रताडित न हुआ करेंगे,चैन से जी सकेंगे.

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

मोनिका जी सच में आज इंसान जानवरों से बदतर हो गया है केवल और केवल अपना स्‍वार्थ अच्‍छा लेख लिखा है आपने

सुनील मंथन शर्मा ने कहा…

अत्याचार का विरोध हमेशा होता रहा है. जानवरों पर हो रहे अत्याचार का भी विरोध होना चाहिए, अत्याचार रोकने का प्रयास मैं भी करने का प्रण ले चूका हूँ.

Dr. Ashok Kumar Mishra ने कहा…

अच्छा लिखा है.

http://www.ashokvichar.blogspot.com

vishal sahasrabuddhe ने कहा…

bhabhi accha likha hai. Maja aagaya padhkar.

संजय भास्‍कर ने कहा…

मोनिका जी सच में आज इंसान जानवरों से बदतर हो गया है केवल और केवल अपना स्‍वार्थ अच्‍छा लेख लिखा है आपने

S.M.Masoom ने कहा…

आपने जानवर देखा जो कमज़ोर था इसलिए वो युवक उसे खाने को भी नहीं देता और उसी को दिखा के कमाता है. वर्षों से गरीब जो की मूक हुआ करता है, उसके खून पसीने से बड़े बड़े साहूकार, पैसे वाले खुद का पेट बहर रहे हैं और इस मूक मजदूर को कुछ टुकड़े ही फेट दिए जाते हैं वोह भी ज़िल्लत के साथ. कमजोरों पे ज़ुल्म एक आम बात है. इनके हक में आवाज़ उठाना ज़रूरी है.